ओ मुक्तिबोध

मीनू मदान, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

देखा है मैंने
हाँ, सब देखा है मैंने
रक्तस्नात शरीर तेरा

तुम्हारे भावों की बैंजनी चट्टान से
बहता लहू 

तुम्हारे वक्ष पर पड़े घावों से रिसता मवाद

तुम्हारी कटी जिह्वा से
उड़ते शब्दों का गुच्छ

तुम्हारी खोपड़ी पर पड़ी
हथोड़ों की मार
और कसमसाहट सुनी है मैंने

समय के बादशाहों के शाही फ़रमान
तब भी थे
आज भी हैं

तुम सुन सकोगे
जंगलों में खोई
मेरी आर्त पुकार!
तो सुन लो एक बार!
ओ मुक्तिबोध!

देखो लो एक बार
मेरी आत्मा से लिपटे ये विषधर
कितनी बार डसा है विषदंतों ने
कितनी बार नीली हुई हूँ मैं
कितनी बार बही है झाग

कितनी बार दागी गई हैं गोलियाँ
मेरे वक्ष पर
बह रहा है रक्त
अजस्त्रोत 

कितनी बार
मेरी गीली गूँज
विलयित हो मेघो में
बरसी है जीवन मरुथल में

कितनी बार रश्मि पुंज पर
झपटा है अँधेरों का बाज

कितनी बार टूटी पसलियों को
सँकेरा है मैंने

तू बोध कर
आ सब बोध कर
कि अब मुक्त हो जाऊँ मैं!
ओ मुक्तिबोध!
नवीं मुंबई, महाराष्ट्र