मध्यप्रदेश में बड़े प्रशासनिक फेरबदल की तैयारी
भोपाल। लंबे इंतजार के बाद अब प्रदेश में एक बार फिर बड़े प्रशासनिक फेरबदल की तैयारी कर ली गई है। इस फेरबदल में करीब आधा दर्जन कलेक्टर , कई नगर निगम आयुक्त और करीब एक दर्जन आईपीएस अफसरों की नई पदस्थापना होनी तय मानी जा रही हैं। पहले दमोह उपचुनाव और फिर कोराना महामारी की वजह से प्रशासनिक फेरबदल रुका हुआ था। यह बात अलग है कि इस बीच भी कई अफसरों को एक-दो आदेश जारी कर बदला जाता रहा है। इस प्रशासनिक फेरबदल के लिए हाल ही में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और मुख्य सचिव इकबाल सिंह बैंस के बीच पहले दौर की मंत्रणा हो चुकी है। दरअसल प्रदेश में कई महत्वपूर्ण संस्थाओं व पदों का अतिरिक्त प्रभार देकर काम चलाया जा रहा है। इसी तरह से कई पुलिस रेंजो में भी डीआईजी के पद लंबे समय से रिक्त चल रहे हैं। प्रशासनिक सूत्रों की माने तो जिन आधा दर्जन जिलों के कलेक्टरों को बदले जाने की तैयारी है उनमें वे कलेक्टर शामिल है, जिनकी अपने जिले के जनप्रतिनिधियों से पटरी नहीं बैठने के साथ ही कामकाज भी तेज गति नहीं पकड़ पा रहा है। यह वे अफसर है जिनके नॉन फरफारमेंस की वजह से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के अलावा व्यक्तिगत रुप से मुख्य सचिव इकबाल सिंह बैंस भी नाराज बताए जा रहे हैं। इसी तरह से कुछ नगर निगमों के आयुक्त भी बदले जाना है। यह वे आयुक्त बताए जा रहे हैं जिनके कामकाज से विभागीय मंत्री भूपेन्द्र सिंह नाराज चल रहे हैं। दरअसल यह नगर निगम आयुक्त कामकाज में बेहद लापरवाह बने हुए हैं, इसके चलते उन्हें कई बार चेतावनी भी विभागीय मंत्री द्वारा दी जा चुकी है। इसी तरह से इस फेरबदल में लंबे समय से रिक्त चल रहे आयुक्त चंबल संभाग, आयुक्त उच्च शिक्षा का पद भी भरा जाना है। इसके अलावा कई आईएएस अफसर ऐसे हैं, जिनके पास नाम के लिए ही कोई काम है, उनमें से कई को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जाएगी, जबकि जिनके पास कई महत्वपूर्ण विभागों का दायित्व होने की वजह से काम बहुत अधिक है उनका बोझ कम किया जा सकता है। इसके अलावा प्रभारियों के भरोसे चल रहे शिक्षा और परीक्षा से जुड़े बड़े संस्थानों मेंं भी पूर्णकालिक मुखिया की पदस्थापना की जानी है। फिलहाल प्रशासनिक अराजकता की हालत यह है कि प्रदेश के कई संभागों में आयुक्त न होने की वजह से कलेक्टरों को अतिरिक्त चार्ज देकर कामकाज का संचालन किया जा रहा है। हद तो यह है कि अपने कामकाज में हमेशा चर्चा में रहने वाले अपर मुख्य सचिव राधेश्याम जुलानिया को शिव सरकार द्वारा बीते कई माह से बैठे बिठाए ही वेतन दी जा रही है। वे इन दिनों बल्लभ भवन में पदस्थ हैं, लेकिन उन्हें किसी भी काम का दायित्व नहीं दिया गया है। दरअसल उन्हें अपने अधीनस्थ महिला आईएएस अफसर से पटरी न बैठने की वजह से करीब ढाई माह पहले 26 फरवरी को माध्यमिक शिक्षा मंडल के अध्यक्ष पद से हटाकर मंत्रालय में बतौर ओएसडी पदस्थ कर दिया गया था। तभी से उनके पास कोई काम नहीं है। खास बात यह है कि कोरोना काल में भी उन्हें कोई काम नहीं दिया गया। जुलानिया के तबादले के बाद से ही माध्यमिक शिक्षा मंडल का काम विभाग की प्रमुख सचिव रश्मि अरूण शमी देख रही हैं। इसी तरह प्रतियोगी परीक्षाओं का जिम्मा संभालने वाले प्रोफेशनल एजामिनेशन बोर्ड का काम भी कई माह से बतौर प्रभारी चेयरमेन एसीएस केके सिंह को देकर चलाया जा रहा है। स्थाई अध्यक्ष न होने की वजह से बोर्ड का कामकाज किस तरह से प्रभावित हो रहा है इससे ही समझा जा सकता है कि बोर्ड द्वारा आयोजित लगभग हर परीक्षा में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियां सामने आने से विवाद की स्थिति बन रही है। हद तो यह है कि प्रदेश में यह पहला मौका है जब सरकार द्वारा जूनियर अफसरों को महत्वपूर्ण और वरिष्ठ अफसरों से सामान्य विभागों का काम कराया जा रहा है। इसकी वजह से अधिकारियों में नाराजगी बनी हुई है। इसे प्रशासनिक अराजकता के रूप में देखा जा रहा है। छोटे कर्मचारियों व अफसरों को करना होगा चार माह का इंतजार उधर प्रदेश सरकार अब तक नई तबादला नीति घोषित करने के साथ ही तबादलों पर लगा प्रतिबंध नहीं हटा सकी है। प्रदेश में अब मानसून के दस्तक देने की वजह से अब सरकार तबादलों के पक्ष में नहीं है। इसकी वजह से अब कर्मचारियों व छोटे अफसरों को बारिश का मौसम निकलने का इंतजार करना पड़ सकता है। फिलहाल अभी वे ही तबादले हो रहे हैं, जिन्हें सरकार बेहद जरुरी मान रही है। यह तबादले भी मुख्यमंत्री स्तर से किए जा रहे हैं। तबादलों से प्रतिबंध नहीं हटने की वजह से बीते दो साल से इंतजार कर रहे कर्मचारियों में अब निराशा का भाव बना हुआ है। तबादलों को लेकर सर्वाधिक इंतजार शिक्षकों द्वारा किया जा रहा था। गौरतलब है कि प्रदेश में दो माह पहले से तबादलों को लेकर विभागों द्वारा तैयारियां की जा रही थीं, जिसे अब रोक दिया गया है। पांच साल बाद भी आईएएस बनने का सपना अधूरा गैर राज्य प्रशासनिक सेवा से आईएएस पदों के लिए होने वाली डीपीसी भी प्रदेश में पांच सालों से नहीं की गई है। इसके पहले 2016 में तत्कालीन मुख्य सचिव एंटोनी डिसा के कार्यकाल में गैर राप्रसे से आईएएस के चार पदों के लिए डीपीसी की गई थी। इसके बाद कमलनाथ सरकार के समय जरुर इसके लिए डीपीसी कराने का प्रस्ताव यूपीएससी को भेजा गया था, लेकिन तब उसकी स्वीकृति नहीं मिलने की वजह से उसे स्थगित करना पड़ गया था। लिहाजा प्रदेश में कई दावेदार अफसर निर्धारित 56 साल की उम्र हो जाने की वजह से इस दौड़ से ही बाहर हो चुके हैं। बदले जाएंगे कई आईपीएस अफसर इस फेरबदल में कई आईपीएस अफसरों का बदला जाना भी तय माना जा रहा है। इसकी वजह है कई रेंजों में डीआईजी के पद लंबे समय से रिक्त चल रहे हैं। इनके अलावा आधा दर्जन जिलों के पुलिस कप्तान और दो रेंज के आईजी भी बदले जाने की संभावना बनी हुई है। जिन जिलों के एसपी बदले जा सकते हैं उन जिलों की कानून व्यवस्था से स्थानीय जनप्रतिनिधियों के अलावा सरकार भी नाखुश बताई जाती है। यह भी रही वजहें दरअसल प्रदेश की सत्ता में भाजपा की वापसी के बाद ही एक के बाद एक संकट बना हुआ है। सरकार बनते ही कोरोना महामारी की पहली लहर आ गई सरकार इससे निपटी तो उपुचनाव आ गए और अब प्रदेश सरकार को फिर कोरोना से निपटना पड़ रहा है। कोरोना से राहत मिलने के करीब है , लेकिन अब बारिश का दौर शुरू हो चुका है। यही वजह है कि सरकार द्वारा की जाने वाली तबादलों की तैयारियों को हर बार रोकना पड़ रहा है।