मेरे लिए टीचर की भूमिका निभा रही मेरी बेटी की बेटी लिली

दिलीप भाटिया, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

 

जीवन संध्या में एक मासूम भोली चुलबुली 6 वर्षीया लिली मेरे लिए टीचर की भूमिका निभा रही है। रिश्ते में लिली मेरी बेटी की बेटी है। मेरी फ्रेंड भी है। राखी के दिन मेरी बहन है। उसने मुझे कई खेल सिखाए इसलिए वह मेरी टीचर है। बचपन के कई भूले- बिसरे खेल उसके साथ खेलकर मैं उन खेलों का रिवीजन कर रहा हूं। कुछ नए खेल भी लिली मैडम ने मुझे सिखाए। उसके साथ सांप सीढ़ी लूडो कैरम के साथ छुपने ढूंढने वाला खेल भी साथ में किस हाथ में क्या है, इत्यादि हम दोनों कई खेल खेलते हैं। खिलौनों की दुकान सजा कर ग्राहक दुकानदार का खेल खेलते हैं। भैया आप तो लूट रहे हो। दीदी आप तो बहुत ज्यादा ले रही हैं। कुछ कम करिए। इस प्रकार बच्ची के साथ बच्चा बनकर समय देने से मेरे स्वास्थ्य में सुधार हो रहा है। इस भूमिका में वह डॉक्टर भी है। ड्राइंग का शौक है। मुझे निशुल्क शिक्षा ड्राइंग की देने के लिए तैयार है। ईश्वर का आभारी हूं कि इस अवस्था में मुझे इतनी अच्छी टीचर मिली। शिक्षक दिवस पर उसे क्या गुरु दक्षिणा दूं, विचार मंथन कर रहा हूं। परिवार के सदस्यों की डांट पड़ती है, उसे तो अपना मूड अच्छा करने के लिए मेरे कमरे में आ जाती है। मेरे पास शब्द नहीं हैं अपनी इस टीचर के लिए।  मेरी किसी बात पर नाराज़ होने पर प्यारी सी दुश्मन भी हो जाती है। नानाजी अभी घर से बाहर निकल जाओ। बचपन की खूबी है कि दस मिनट बाद स्वयं ही आकर कहती है दिलीप अंकल खेलें। यह फोन किताब अखबार बंद कर मेरे साथ खेलों । लिली टीचर की मेरे वर्तमान जीवन की भूमिका के लिए मरे पास लिखने के लिए दो लाइन हैं-

घर से मंदिर बहुत दूर है

चलो किसी बेटी का मूड अच्छा कर उसे हंसाया जाए

इतनी अच्छी टीचर को एक विद्यार्थी का प्रणाम।                            


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