मानवीय संवेदनाओं का आईना है लघु फिल्म अंटू की अम्मा (फिल्म समीक्षा)

डा हिमेन्द्र बाली "हिम", शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

 

समाज के बदलते सरोकार और मर्यादाओं की असामयिक मौत आज के युग की भयावह त्रासदी है। स्वहित की शूद्र सोच को बेनकाब करती फिल्म अंट्टू की अम्मा में गाय जैसे निरीह व मूक जीव के प्रति जो भावनात्मक रिश्ता बच्चे का चित्रित किया गया है। वह आज के छद्म सभ्य समाज की भावशून्यता पर तीक्ष्ण प्रहार है। अंट्टू की मां समाज की बदली सोच के चलते दुधारू गाय जो अब और लाभकारी नहीं है, को बेसहारा छोड़ देती है। बेटा गाय से कायम हुए भावनात्मक रिश्ते के कारण गाय के गायब होने के कारण बेचैन हो उठता है। प्रशासन के नृशंस व्यवहार से वह लड़का आक्रोश से भर उठता है और उससे टकरा जाता है।

अपने बेटे के पिता की अमानत गाय से जुड़े लगाव से द्रवित होकर मां का ह्रदय पसीज जाता है। मां को अपनी गलती का एहसास हो जाता है और नकारा समझी गई गाय को ढूंढ निकालने मे हाथ बंटाती है। फिल्म में मानवीय मूल्यों एवम् संवेदनाओं को जागृत करने का जो प्रयास गाय के माध्यम से किया गया है, वह आज के आत्म केन्द्रित व एकाकी जीवन की नीरता और अवसाद पर सटाक तंज है।


फिल्म के कलाकार विक्की चौहान का अध्यापक का रोल सहज और प्रभावी है। अंट्टू की मां के रोल को भी चरित्र के स्वभाव के अनुरूप पूरी निष्ठा से निभाया गया है। अन्य कलाकार पुलिस आरक्षी की भूमिका में सौरभ सूद ने चरित्र को सजीव अपने अभिनय में उतारा है। बाल कलाकार ने बड़े जीवंत ढंग से अपनी संवेदनाओं को व्यक्त किया है। समग्रत:यह फिल्म क्षीण होते मूल्यों को नवजीवन देने का सबल प्रयास है। फिल्म की पटकथा चुस्त और यथार्थ की जमीन पर खड़ी है। निर्देशन बहुत ही उत्कृष्ट और सदा हुआ है। फिल्म का हर दृश्य रोचक और बांधने वाला है।

 

मुख्य संपादक स्वर मदुला एवं अध्यक्ष सुकेत संस्कृति एवं जनकल्याण मंच कुमारसैन (शिमला) हिमाचल प्रदेश