डायनों के अनिष्ट की परम्परा से जुड़ी है डाग चौदश

डा हिमेंद्र बाली, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

 

पूरे सतलुज -ब्यास घाटी क्षेत्र में भाद्रपद कृष्ण चतुर्दशी को डायनों को प्रभावित सर्वाधिक माना जाता है। सम्भावित अनिष्ट को निष्क्रिय करने के लिए कुल पुरोहित यजमान के घर जाकर अभिमंत्रित सरसों के दाने अर्पित करता है, जिन्हें चतुर्दशी की सांय घर में प्रक्षेपित किया जाता है। घर के मुख्य द्वार पर गोबर के साथ अभिमंत्रित सरसों आलेपित किया जाता है। घर के चारों कोनों पर भेखल झाड़ी की डाली को रखकर डायनों के प्रकोप का नष्ट किया जाता है। भेखल के अतिरिक्त टिम्बर की कंटीली झाड़ी की डालियों को भी डायनों के अनिष्ट को समाप्त करने के प्रयोजन से लगाया जाता है।

कुमारसैंन  क्षेत्र में सांय भेखल सरसों को मुख्य द्वार व गोशाला के द्वारों पर लगाया जाता है। द्वार पर खीरा या मक्की को द्वार पर काटा जाता है। ऐसा करते हुए यह माना जाता है कि डायन का सिर काट डाला है। कोटगढ क्षेत्र में भी डायनों केे दुष्प्रभाव को समाप्त करने के लिए सरसों व भेखल को मुख्य द्वार पर लगाया जाता है। बड़ागांव सांगरी में भी डाग चौदश के दिन सरसों व भेखल को दरवाजों पर लगाने की परम्परा है। वास्तव में भादो महीने को सतलुज घाटी में अंधेरा महीना माना जाता है। इस महीने कोई भी मंगल कार्य मंदिरों व घरों में नहीं किए जाते हैं।

ऐसी मान्यता है कि देवी देवता इस महीने शयन करते हैं या स्वर्ग वास पर रहते हैं। अत: क्षेत्र में देव समुदाय के शयन या स्वर्गवास पर होने से अनिष्टकारी शक्तियां सक्रिय रहती हैं। मंदिरों में कुमारसैन व सांगरी क्षेत्र में सांय घी के दीये जलाए जाते हैं। धूप की जगह घी के अग्नि हाेत्र से पूजा सम्पन्न होती है। घरों में कुमारसैन के क्षेत्र में भादों महीने में घर की पूर्व दिशा में चीड़ा पर सांय अनिष्टकारी शक्तियों के निराकरण के लिए लकड़ियों से रोशनी की जाती है। चीड़ा चौकोर मण्डल होता है, जिस पर गोबर को द्रुवा के साथ प्रतिष्ठित किया जाता है। ऊपर से एक चपटी शिला रखी जाती है। सांय आग प्रज्ज्वलित कर ऐसे पद्य बोले जाते कि मेरे घर के पिस्सू-खटमल दूसरे घर में चले जाए। कोटगढ़ क्षेत्र में भी एक घर दूसरे घर के चीड़े को नीचा दिखाने के लिए चीड़े का महिमा मण्डन करते हैं। 


भादों के महीने में देवताओं के भौड़ या अंगरक्षक देवता आवेश में आकर अपने क्षेत्र में रात्रि में घूम कर लोगों का रक्षण करते हैं। सतलुज के पश्चिम में मण्डी -सुकेत क्षेत्र में डायनों व देवताओं के मध्य युद्ध की मान्यता प्रचलित है। सुकेत क्षेत्र में बलिंडी के पास डैण काण्डा गांव है, जो कभी डायनों की शरणस्थली थी। ऐसी मान्यता है कि भादों महीने में नाग व देव डायणी के काण्डे की यात्रा करते हैं। वहां वे डायनमो, राक्षस, शंखिनी व प्रेतों के साथ हार पाशा खेलते हैं। जो नाग या देवता जीत कर आते हैं, उसकी देवठी में सुख-सम्पति होती है। हार जाने पर व्याधियां, अपशुकन व बाढ़ वर्षा का प्रकोप रहता है। तेरहवी शताब्दी के लोक कवि धूरजट्ट की भार भाषणी में नाग माहूं के काण्डा में डायनों के साथ लड़ने जाने का उल्लेख है-

भदरे महिने काण्डे ले जाओ

रैत वलैत नागा लै नवाओ. 

मण्डी में जोगिन्द्रनगर के समीप घोघर धार में बीस भादों को डायनों व देवताओं का युद्ध होता है। यहां यदि देव जीते तो वे लोगों की फसलें रौंद देते हैं। यदि हार जाए तो खिन्नता के कारण चुपचाप लौटते हैं और लोगों को याद करते हैं। देवता अपने आगमन के विषय में स्वप्न और दृष्टांत के माध्यम से सूचित करते हैं। सूचना पाकर लोग गाजे बाजे के साथ उन्हें गांव के बाहर से लाते हैं। इस प्रकार जहाज़ी या डग्वांस के संदर्भ में व्याप्त लोक मत आज भी प्रचलित है। चूंकि अनिष्टकारी शक्तियां प्राचीन काल से इष्ट शक्तियों से लड़ती रहीं हैं, डगैण या डग्वांस के अवसर पर हमारी अपनी देव परम्परा पर आस्था ही परिपुष्ट होती है।

 

साहित्यकार कुमारसैन (शिमला) हिमाचल प्रदेश