शिवपुराण से....... (249) गतांक से आगे.......रूद्र संहिता (प्रथम सृष्टिखण्ड़)


शिवपूजन की सर्वोत्तम विधि का वर्णन .........


गतांक से आगे............


फिर गुरू का स्मरण करके उनकी आज्ञा लेकर विध्वित् संकल्प करके अपनी कामना को अलग न रखते हुए पराभक्ति से सपरिवार शिव का पूजन करें। एक मुद्रा दिखाकर सिन्दूर आदि उपचारों द्वारा सिद्धि-बुद्धि सहित विघ्नहारी गणेशजी का पूजन करके उनके नाम के आदि में प्रणव तथा अन्त में नमः जोड़कर नाम के साथ चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग करते हुए नमस्कार करे। (यथा-ओईम गणपते नमः अथवा ओईम लक्षलाभयुताय सिद्धि-बुद्धि सहिताय गणपतये नमः) तदन्तर उनसे क्षमा-प्रार्थना करके पुनः भाई कार्तिकेय सहित गणेश जी का पराभक्ति से पूजन करके उन्हें बारम्बार नमस्कार करें। तत्पश्चात सदा द्वार पर खड़े रहने वाले द्वारपाल महोदय का पूजन करके सती-साध्वी गिरिराजनन्दिनी उमा की पूजा करें। चन्दन, कुमकुम तथा धूप, दीप आदि अनेक उपचारों तथा नाना प्रकार के नैवेद्यो से शिवा का पूजन करके  नमस्कार करने के पश्चात् साधक शिवजी के समीप जाये। यथासम्भव अपने घर में मिट्टी, सोना, चांदी, धातु या अन्य पारे आदि की शिव प्रतिमा बनाये और उसे नमस्कार करके भक्तिपरायण हो उसकी पूजा करें। उसकी पूजा हो जाने पर सभी देवता पूजित हो जाते हैं।
मिट्टी का शिवलिंग बनाकर विधिपूर्वक उसकी स्थापना करें। अपने घर में रहने वाले लोगों को स्थापना-सम्बन्धी सभी नियमों का सर्वथा पालन करना चाहिए। भूतशुद्धि एव मातृका न्यास करके प्राण प्रतिष्ठा करें।           (शेष आगामी अंक में)