1957 मे बनी वन विभाग की गलेयोग (पांगणा) की गार्ड हट को धरोहर भवन घोषित करने की मांग

राज शर्मा,  शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

 

हिमाचल प्रदेश मण्डी जिले की उप-तहसील पांगणा के अन्तर्गत गलेओग गांव हिमाचल के सशक्त नाग महाभारत के महायौद्धा व महादानी कौन्तेय कर्ण रूप माहूं नाग के पुण्यस्थान के लिए प्रख्यात है। तेरहवीं शताब्दी के आंचलिक इतिहास लेखक धूर जट्ट ने काव्यात्मक उपाख्यान में माहूं नाग गलेओग के पराक्रम व संरक्षक देव के रूप में विशद वर्णन किया है। माहूंनाग भादो महीने में अनिष्टकारी डायनों को परास्त करने के लिए बलिण्डी के समीप काण्डा गांव जाते है और डायनों काे परास्त कर प्रजा के अनिष्ट को हर लेते हैं। यहीं काण्डा जाते हुए रास्ते में रक्सेटा को पराजित कर अपना गण बना लेते हैं। गलेओग तरखान बहुल गांव है। अधिकतर गलयोग निवासी आर्थिक दृष्टि से ज्यादा आत्मनिर्भर नहीं है, परन्तु  सांस्कृतिक और ऐतिहासिक  दृष्टि से समृद्ध व जागरूक है। धार्मिक परम्पराओं का निर्वहन पूरी निष्ठा से करते हैं।

गांव में 1957 में बना गार्ड हट है जो पत्थर व काष्ठ निर्मित पहाड़ी शैली में बना है।यह हट 12×12 फुट के दो कमरों का सैट है।कमरों की ऊंचाई  भी 12फुट है। जहां आजकल बीट गार्ड का आवास है। सन् 1978 तक यह हट सुकेत वन उपमण्डल के अधीन थी। इसके पश्चात् करसोग वन मण्डल का गठन होने के बाद करसोग वन-मंडल के पांगणा वन परिक्षेत्र के अधीन आ गई. समभवत: यह हट सुकेत क्षेत्र की सबसे पुरानी हट है जो पहाड़ी शिल्प के कारण पूरे क्षेत्र में अद्वितीय है। चूंकि इस हट को स्लेटों से ढलवा छत्त में ढाला गया है। कमरों की सतह और छत को सुन्दर लकड़ी से ढका गया है जो शायद सर्दी के प्रकोप को रोकने के प्रयोजन से किया गया होगा।दीवारें पथ्थरों से बनी है,जो पारम्परिक राजगीरी का उत्कृष्ट उदाहरण है। दीवारों में थोड़े अन्तराल पर लकड़ी के छः ईच मोटे स्तम्भों/शहतीरो को क्षितिजीय ढंग से अढ़ाई-तीन फुट लंबा सुघड़ स्थानीय पत्थर से बनी पुष्ट  दीवारों में चिना गया है, जो हट के बाहरी सौंदर्य को बढ़ाने वाला है।

लगभग छ: हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित गलेओग की यह गार्ड  हट किसी धरोहर भवन से कम नहीं है। धरोहर भवनों के प्रति जागरूकता के अभाव  के कारण इसकी बाहरी दीवार पर चूने की पर्त और हरा रोगन करने से इसके स्थापत्य कला दर्शन पर इस से थोड़ी आँच आयी है, लेकिन चूने की पर्त व रोगन को सहजता से हटाकर पुरातत्व की सुरक्षा कर इसकी प्राचीन सांस्कृतिक अस्मिता को बनाए रखा जा सकता है। यहां का प्राकृतिक नजारा मनोहारी है। सुकेत संस्कृति साहित्य एवं जन कल्याण मंच पांगणा  के अध्यक्ष साहित्यकार डाक्टर हिमेन्द्र बाली "हिम",जिला परिषद वार्ड सराहन (करसोग) के सदस्य श्याम सिंह चीहान(पूर्व अधिक्षक वन-मंडल करसोग), पुरातत्व चेतना संघ मंडी द्वारा चंद्रमणी कश्यप पुरातत्व चेतना राज्य पुरस्कार से सम्मानित डा. जगदीश शर्मा और व्यापार  मंडल पांगणा के अध्यक्ष सुमित गुप्ता ने मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर को पत्र लिखकर मांग की है कि इस भवन को धरोहर भवन घोषित किया जाए। यदि इस भवन को धरोहर भवन घोषित कर पर्यटन के लिए सुलभ किया जाए तो इस क्षेत्र की धर्म संस्कृति के दर्शन भी बाहर से आने वाले लोगों को सम्भव होंगे तथा साथ ही ईको पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा। गलयोग में अनेक स्थान गौरवमय इतिहास को भी संजोए हुए हैं। 

गलयोग गांव राजसीकाल के पांगणा-सुंदर नगर राजपथ पर स्थित है। आज यह गांव पांगणा से कैंचीमोड़ -सरही-खंदक होकर वाहन योग्य मार्ग से जुड़ गया है। गलयोग गार्ड हट की इस शैली के भवनों का आज लोप होता जा रहा है। अतः मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर जी से निवेदन है कि 63 वर्ष पुराने इस भवन को धरोहर भवन घोषित कर कृतार्थ करें।


संस्कृति संरक्षक आनी (कुल्लू) हिमाचल प्रदेश