रिश्तों को ताजा करने की पहल, डा॰ मिली ने अपनी बुआ को भेजा संदेश

डा.मिली भाटिया, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

 

प्रिय जया दानी आंटी!

आप हमेशा से मेरी माँ की सबसे प्रिय सहेली, मेरे पापा की सर्वप्रिय बहन और मेरी दादी की सबसे प्रिय बेटी रहीं।  B.A फ़र्स्ट ईयर में एडमीशन लिया ही था मैंने, तब मम्मी मुझे छोड़कर ईश्वर के घर चली गईं थी। जब खून के रिश्तों ने मुँह मोड़ा, तब आपने दुनिया की भीड़ में अकेली, सहमी मिली के आँसू पोंछे थे और बखूबी सम्भाला था। माँ जाने के ग़म में इस बेटी को दिन में चार बार मोसंबी का जूस निकाल कर पिलाया और उसके लो बीपी को ठीक करती गईंलो जब में छुट्टियों में हॉस्टल से घर आती थी, तब पापा के ऑफ़िस चले जाने के बाद अकेली बेटी का फ़ोन पर दर्द बाटती, मुझे अपने घर बुलाकर खाना खिलातीं थी। हॉस्टल से जब मैं मना कर देती थी, तब भी काम करने वाली कमला आंटी के हाथों मेरे लिए माँ अन्नपूर्णा की तरह टिफ़िन भेजतीं थी। धरती पर आप ईश्वर नहीं तो और क्या हें? मुझे B.A फ़र्स्ट ईयर से PHD तक के सफ़र में मेरा होसला बढ़ाया और जब मैं शादी करके विदा होने लगी तो अपने दामाद को ढेर सारी हिदायतें दी थी कि मेरी मिली का ध्यान रखना। आपके प्यार को, आपसे रिश्ते को क्या सम्बोधन दे ये बेटी? आप सच में मिली के लिये इस धरती पर देवी माँ का रूप हैं, मेरी शक्ति हैं, मेरी ईश्वर हैं। आज भी अजमेर से रावतभाटा में अपनी मिली के सारे सुख-दुःख फ़ोन पर बाटती हैं। आपने जो मेरे लिए किया है, उसके लिए आंटी बहुत छोटा शब्द है, इसलिए आपको आंटी नहीं बोलूँगी। आपकी बेटी डा॰ मिली।

 

रावतभाटा, राजस्थान