मेघालय में मूल खासी मातृवंशात्मक समाज में नारी, माँ से मिलता है संतान को अपना और वंश का नाम

डॉ अनीता पंडा, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

 

भारत के पूर्वोत्तर राज्य अपनी संस्कृति एवं विरासत तथा इसमें सन्निहित मानवीय मूल्यों की दृष्टि से विशिष्ट स्थान रखते हैंI यहाँ की मूल जनजातीय संस्कृति एवं परम्परा में गम्भीर चिंतन है, जिसको  उजागर करना आवश्यक हैI ऐसे ही मेघालय की गारो, खासी और जैन्तिया या पनार जनजातीय संस्कृति हैI यहाँ भारत के अन्य राज्यों की भाँति पितृसत्तात्मक के विपरीत 

एक अलग प्रकार की मातृवन्शात्मक परम्परा मिलती है, जो आज भी चली आ रही हैI आमतौर पर संतान का कुल-नाम पिता के वंशावली से निर्धारित होता है, परन्तु मूल खासी-पनार, गारो समाज में संतान को अपना नाम और वंश माँ से मिलता है माँ से मिलता हैI इसके कारण लोग सोचते हैं यह एक ऐसी जगह है, जहाँ स्त्रियाँ शासन करती हैंI 

ऐसा कहा जाता है कि आरम्भ में देश के अन्य क्षेत्र की तरह यहाँ भी पितृसत्तात्मक व्यवस्था थीI मातृवन्शात्मक व्यवस्था के पीछे एक ठोस वजह थीI कारण यह था कि घर के पुरुष लम्बे समय के लिए युध्द और शिकार करने के लिए घर से बाहर चले जाते थे और अक्सर वे लौट कर नहीं आते थेI ऐसे में बच्चे केवल अपनी माँ के ही पास रहते थे और घर की महिलाओं को सारी जिम्मेदारियाँ निभानी पड़ती थीI यह देख कर समाज के बड़े-बुजुर्गों ने सलाह-मशविरा करके निर्णय लिया और संतानों को उनकी माँ के वंश का नाम दियाI तब से यह परम्परा आज तक चली आ रही हैI नारी को इतना सम्मानजनक स्थान देने का उत्कृष्ट उदाहरण और कहाँ मिल सकता हैI इस व्यवस्था में स्त्रियों विशेष स्थान प्राप्त है क्योंकि वे उत्पादन एवं प्रजनन में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, उनमें मातृत्व शक्ति हैI अपने वंश समूह की प्रेरक होने के कारण महिला को सम्पति का अधिकार मिला हैI

खासी रिवाज के अनुसार वर विवाहोपरांत वधू के घर जाता है और संतानोपरांत स्थाई रूप से रहने लगता हैI साथ ही संपत्ति की हक़दार सबसे छोटी बेटी होती है, जो अपने माता-पिता एवं घरवालों की देखभाल करती हैI शिलांग टाइम्स की संपादक पैट्रीशिया मुखीम का कहना है, “सबसे छोटी बेटी को सम्पति का वारिस बनाने की वजह यह है कि माँ-बात को ऐसा लगता है, वह मरते दम तक उनकी देखभाल कर सकती है और वे बेटी पर आश्रित रह सकते हैं I”  अगर परिवार वालों को लगता है कि वह अपनी जिम्मेदारी ठीक से निभा पा रही है तो वह सम्पति घर की बड़ी बेटी को हस्तरान्तरित कर दी जाती है, पर सम्पति की अधिकारी स्त्री ही होती हैI अगर किसी घर में लड़की नहीं है तो उसे एक बच्ची गोद लेना पड़ता है, जिससे वह वारिस बन सके, क्योंकि नियमों के मुताबिक उनकी सम्पति बेटे को नहीं दी जा सकती हैI  ध्यातव्य है कि यद्यपि सम्पति की अधिकारी महिला होती है, परन्तु उससे सम्बन्धित कोई फैसला वह अकेले नहीं ले सकती हैI ऐसे फैसले में मामा एवं भाइयों की सहमति आवश्यक हैI खासी समाज में मामा की अहम भूमिका होती हैI मूल खासी समाज में स्त्रियों का विशेष स्थान है, जो ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता” को चरितार्थ करती है, परन्तु कुछ सीमाओं के साथI राधोन सिंग बेर्री खर्वान्लांग द्वारा खासी में लिखित (खासी आचार संहिता / नियम) तथा अंग्रेजी में बिजोया सवियन द्वारा अनुवादित “का जिन्ग्सनेंग त्यम्मेन अर्थात् The Teaching of Elders” में नारी की खासी समाज में सम्मानजनक स्थान को इस प्रकार वर्णित किया गया है –

हर स्त्री है धन की देवी के समान,

वह रखती है सुरक्षित कमाई और सबकी अच्छी सेहत;

महिला है घर की नींव,

स्वीकारती है दोनों सौभाग्य और दुर्भाग्य;

महिला है रानी मधुमक्खी जैसी,

वह होती है और सुन्दर, जब हो शांति से भरी;

महिला है भरी सूर्य के चमक से,

वह बढ़ती है और प्रकाशित करती है अपनी पवित्रता से;

औरत है एक सोने की मोहर,

है वह किफायती और करती है सम्पति की देखभाल;२  

सिलबी पासाह, जो मेघालय की प्रथम हिंदी शिक्षिका, राष्ट्रपति शिक्षक सम्मान एवं संरक्षिका मूल खासी संस्कृति (लोक नृत्य, संगीत आदि) का मंतव्य है, “खासी समाज में महिलाओं का बहुत सम्मानजनक स्थान है, क्योंकि परिवार की केंद्र बिंदु स्त्री (माँ ) होती हैI पूरे परिवार की देखभाल करती है और प्रत्येक निर्णय में उसकी अहम् भूमिका होती हैI इस समाज में बेटे और बेटियों में भेदभाव नहीं होता हैI पहले स्त्रियों को परिवार सम्बंधित हर कार्य आदि के लिए निर्णय लेने की आज़ादी थी, परन्तु उन्हें घर से बाहर कार्य करने और प्रशानिक सम्बन्धी निर्णय की छूट नहीं थी, पर समयानुसार परिवर्तन आया है I” ३ इसके पीछे मूल कारण है परिवार की स्त्रियाँ उस वंश की प्रतिष्ठा का प्रश्न है I “का जिन्ग्सनेंग त्यम्मेन” में कहा गया है –

स्त्रियों को न दो बहुत अधिक आजादी,

दुनियादारी उनमें नहीं आ सकती;

उनका स्त्रीत्व होगा पतित,

वह देगी धमकी, करेगी अकारण बहस;

इससे खो देगी वह अपना सम्मान I 

खासी समाज में महिलाओं का बहुत ऊँचा स्थान है, परन्तु उनकी कुछ मर्यादाएँ भी हैंI ऐसा इसलिए कहा गया है, क्योंकि स्त्रियाँ भावुक होती हैंI वे अक्सर दिल से निर्णय ले लेती हैं, जो सही नहीं हो सकता हैI यद्यपि घर के सभी निर्णय लेने में उनकी विशेष योगदान होता है, परन्तु घर के बाहर बड़े-बड़े निर्णय लेने से उन्हें अलग रखने की बात कही गई है-

स्त्रियाँ !

जब आप करें बातचीत,

आप बोलें, जब आप मुस्कराएँ

अपने दाँत नहीं दिखाएँ

साथ ही उन्हें अनजान लोगो से ज्यादा घुलने-मिलने से रोका गया हैI इसके पीछे कारण यह है कि लोग सच जाने बिना उनको बदनाम कर सकते हैंI यह नियम केवल स्त्रियों के लिए ही नहीं हैं, अपितु पुरुषों के लिए भी है – 

पुरुष!

मत आकर्षित हो,

जब औरत हो बहुत सुन्दर,

प्रकट होगी उसकी सच्चाई तो

हो इसके विपरीत

इसके साथ ही मूल खासी समाज विवाह में स्थायी संबंधों पर जोर दिया गया है। खासतौर पर जब पत्नी गर्भवती हो, क्योंकि इनका मानना है  –

एक बार तुमने किया विवाह और जुड़े एक वंश से,

मत छोड़ना अपनी पत्नी को, जब हो वह गर्भवती; 

अगर कोई करता है यह जघन्य पाप, 

वह होगा प्रत्येक व्यक्ति द्वारा बहिष्कृत,

नष्ट करेगा वह अपना जीवन और अस्तित्व

खासी समाज में प्रेम विवाह को पूर्णरूपेण मान्यता प्राप्त है। यहाँ लड़के और लडकियाँ स्वेच्छा से ही जीवन साथी का चुनाव करते हैं। इस समाज में जाती-पाँति का कोई बंधन नहीं है, केवल एक वंश (कुर / गोत्र) में विवाह निषेध है। चाहे पिता का या माता का गोत्र हो। वे ऐसे संबंधों को एक गंभीर दोष माना जाता है। अत: किसी से विवाह करने के पहले उनके गोत्र या कुर (खासी में) की गंभीरता से जाँच करने का निर्देश दिया गया है। ध्यातव्य है कि खासी समाज में  मातृवन्शात्मक व्यवस्था होने के कारण न ही यहाँ कोई दहेज़ प्रथा है, क्योंकि विवाह के बाद वर वधू के घर यानि ससुराल चला जाता है और संतान के जन्म के बाद स्थायी रूप से रहने लगता है। बहु विवाह स्त्री एवं पुरुष दोनों ही कर सकते हैं और यह समाज द्वारा स्वीकृत है तथा तलाक और विधवा-विवाह आसानी से हो जाते हैं। एक तलाकशुदा और विधवा स्त्री को भी समान इज्जत प्राप्त है। सामाजिक नियम बहुत सरल, सीधे-सादे हैं और  इसमें स्त्रियों को अपना निर्णय लेने की पूरी स्वतंत्रता है। अन्य समाज की तरह तलाकशुदा एवं विधवा-विवाह आदि को ले कर कोई पूर्वाग्रह नहीं है। इसे सहजता से लिया जाता है। हाँ! शिक्षा एवं जारुकता के अभाव में कम उम्र में ही लड़के-लड़कियाँ विवाह कर लेते हैं, जो शिक्षा के प्रचार-प्रसार के कारण धीरे-धीरे कम हो रहा है। कानूनन कोई खासी पुरुष गैर खासी स्त्री से विवाह कर लेता है तो उनकी संतानें खासी मानी जाएँगी। अगर उसकी पत्नी खासी रीति-रिवाज, धर्म, नियम एवं अनुष्ठान को अपनाने के लिए तैयार हो जाए, चूँकि खासी एक मातृवंशात्मक समाज है। अत: कुछ अनुष्ठान करके वह खासी बन सकती है। अनुष्ठान के द्वारा धार्मिक स्वीकृति के बाद वंश का नया उपनाम (सरनेम) दिया जाता है। उसी समय से वह खासी बन जाती है और सम्पति की अधिकारी बन जाती है।

स्थानीय दरबार (पंचायत) स्तर पर महिलाओं की भागीदारी नहीं होती है, इसमें पुरुषों का एकाधिकार होता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि महिलाओं की बात नहीं सुनी जाती है। किसी भी मामले में वे अपने विचार प्रकट करने के लिए स्वतंत्र है, पर वे दरबार में स्वयं उपस्थित नहीं हो सकती है। वह अपनी बात घर के किसी पुरुष सदस्य पिता, मामा या चाचा को प्रतिनिधि बना कर प्रकट कर सकती है। महिलाएँ दरबार में खास परिस्थितियों में उपस्थित हो सकती हैं, जब किसी महिला को उसके गलत कार्यों के लिए सज़ा देनी हो, तब भी वे अपना केस स्वयं नहीं अपितु उसके मामा-चाचा के माध्यम से कर सकती है।

मूल खासी समाज में महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी मानी जाती है। वे घर की मुखिया होती हैं और कृषि, व्यापार आदि में भारी संख्या में सफलता पूर्वक कार्य कर रहीं हैं, परन्तु राजनीतिक स्तर पर उनकी भागीदारी बहुत कम होती है। मातृवंशात्मक समाज में महिलाओं सम्बन्धित अपराध नहीं के बराबर है। देश के अन्य भागों की तुलना महिलाएँ सुरक्षित हैं और उन्हें समाज में विशिष्ट स्थान प्राप्त है। इस समृध्दशाली जनजातीय मूल खासी समाज में नारी से सम्बंधित नैतिक मूल्य एवं परम्पराएँ है जैसे – जातिगत एवं लिंगगत भेदभाव दहेज़ प्रथा रहित, विधवा विवाह, पुनर्विवाह आदि को मान्यता तथा सम्पति में महिलाओं का अधिकार, अपने विचारों को प्रकट करने की पूर्ण स्वतंत्रता आदि समाज के लोगों के लिए अनुकरणीय हैं।

अर्बन अफेयर रेसिडेंशियल कॉम्पलेक्स, 97 खार मालकी शिलॉंग, मेघालय