जब नाग देवता के तप को भंग करने लगी यक्ष यक्षिणियाँ

टी सी ठाकुर, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

 

हिमाचल प्रदेश मण्डी जिला के उपमण्डल करसोग से 33 किलोमीटर दूर खन्योल गांव में स्थित है, श्री नाग हूंगलू जी का भव्य काष्ट प्रस्तर पहाड़ी संयोजक शैली में बना मंदिर। नाग हुंगलू जी का मूल जन्म स्थल यहाँ से कुछ ही दूर डींग नाम गांव पर है। लोक मान्यताओं व लोक जनश्रुतियों  के अनुसार कहा जाता है नाग हुंगलू जी एक शासक थे, जो  राज-पाट त्यागकर मानसिक शांति के लिए वर्षों तक वनों की खाक छानते रहे। अंततः घूमते-घूमते डींग गांव पहुंचे। इस स्थान पर चौरासी सिद्ध (च्वासी सिद्ध) मिले, जिनके प्रभाव से राजा ने दीक्षा प्राप्त कर संन्यास ले लिया। कुचाली प्रवृत्ति के छौई, कमाङू, ढवराची आदि यक्ष यक्षणियां जब तप भंग करने लगी तो उन्हें तप बल से परास्त कर इस स्थान पर विराजमान हो गये और कालांतर में यह प्रतापी जन कल्याणकारी राजा हुंगलू देवता के नाम से पूजे जाने लगे। धीरे-धीरे लोगों की मनोकामनाएं नाग हुंगलू जी की कृपा से पूर्ण होने लगी।


नाग हुंगलू की पूजा विशेष रूप से क्लिष्ट रोगों की मुक्ति हेतु व पशु धन की रक्षा और जीवन रक्षा के लिए की समस्याओं से हल होने के प्रति बढने लगी। आज नाग हुंगलू च्वासी क्षेत्र में एक बड़े प्रतापी और कल्याणकारी देवता के रूप मे पूजे जाते है। 20 आषाढ़ को नाग हुंगलू जी का जन्मदिन, 28-29 बैसाख को कताण्डा ठिरशु, 25-26 मेला शूपी जातर सोमाकोठी और श्रावण महीने में झाकङु मेला महोग व मार्गशीष महीने में बूढ़ी दीपावली पांरम्पिक वेशभूषा से होती है।

नाग हुंगलू सुकेत रियासत के ऐसे एकमात्र देवता है, जो बिना छत्र के चलते है। वर्तमान समय में श्री नाग हुंगलू जी एक बड़े शक्तिशाली देवता के रूप में पूजा जाता है ।


च्वासी करसोग, (मण्डी) हिमाचल प्रदेश