यह आलोचना नहीं संवाद है, अनुप्रिया तक पहुंचे (जन्मदिन विशेष)

प्रभाकर सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

 

अनुप्रिया आज दिवंगत सोनेलाल पटेल की तैयार की हुई जमीन पर फसल काट रही है। संसद में धारदार भाषण के अलावा जमीन पर और संघर्षों की कहानी क्या है, यह उन्हें बताना चाहिए। हम समझ रहे है की वे अपनी ताकत धीरे-धीरे बढ़ाना चाहती है, लेकिन यह भी सत्य है की इस धीरे-धीरे का अपना जोखिम है। जिन्दा कौमें इन्तजार नहीं करती। संघ ने जो मंडल पार्ट- २ की जमीन तैयार की है, इसे संभालने के लिए अभी भी उतर प्रदेश में अखिलेश यादव ही तत्पर है। आपकी तत्परता सिर्फ भाषणों में होती है। आप संसद में भाषण धाराप्रवाह देती है, प्रभावी तरीके से अपनी बात रखती है, लेकिन एक लाइन मोदी जी के... हमारी सरकार... जोड़ कर चिराग पासवान की तरह सुविधावादी हो जाती है। देश की सबसे बेहतरीन युवा नेत्री को बिना लाग लपेट के बोलने में हिचक नहीं होनी चाहिए। आपकी सरकार है कहाँ? यह सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने में क्यों डर रही है? मिर्जापुर की सांसदी का डर है? कब तक डर कर राजनीति करेंगी? डर के साए में सोनेलाल पटेल कभी नहीं जिए और डरपोक नेता के साथ जनता भी नहीं जाती है, इसलिए नेता को सशक्त होना चाहिए।

सशक्त कैसे बना जाता है, यह उदाहरण बिहार में है। 1996 में बिहार में लालूजी के सामने कोई विकल्प नहीं था। तब नितीश कुमार की सीटों की ताकत 6 थी, लेकिन उस वक्त भी उन्होंने बिहार को लीडरशिप देने की बात की। तब हिंदुस्तान समेत तमाम अखबार नितीश कुमार को बिहार का चाणक्य बताते थे, क्योंकि उन्होंने लीडरशिप का दावा ठोका था? आप तो अभी लीडरशिप का दावा ठोकने में भी देर कर रही है? ऐसे होगा सामाजिक न्याय?


2005 में नितीश कुमार ने लगभग 29 बाहुबलियों को टिकट देकर मैदान में उतार दिया था। तब यह जरुरी भी था, अन्यथा महाबली लालूजी के सामने खड़ा होना किसी के वश की बात नही थी। नितीश के अधिकतर दबंग विधानसभा पहुँचने में कामयाब रहे, लेकिन सरकार बनी तो नितीश कुमार ने इन बाहुबलियों को भी बारी-बारी से निपटा दिया, क्योंकि वे जानते थे की अंततः जनता ही बाहुबली होती है। अर्थात बल का अपना महत्त्व है।

यह बाहुबली नितीश कुमार के पास कैसे आये? क्योंकि नितीश कुमार जमीन पर कार्यकर्ताओं के साथ संवाद में यकीन रखते थे। इनके पास जन समर्थन आने लगा था। उन्होंने कभी भी खुद को भाषणों वाले नेता के रूप में स्थापित करने पर जोर नहीं दिया। अम्बेसडर कार से बिहार के हर हिस्सों में ख़ाक छानते रहे। तमाम प्रकार के प्रजातियों को अपने दल में प्रश्रय दिया, लेकिन सता में आने के बाद कभी भी गलत कृत्य नहीं किया, जिससे छवि को नुक्सान पहुंचे। अपने ख़ास लोगों को भी गलत कार्य करने पर जेल में डालने से गुरेज नहीं किया।

बड़े बुजुर्ग कहते है की बिना लाग लपेट के निडरता से बातें कहना साहसी सोनेलाल पटेल की शैली बेहद धारदार थी। चूँकि उन्होंने बसपा से अलग होकर अपना दल की स्थापना की थी, इसलिए वो कुछ ख़ास अलग नहीं कर सके, लेकिन वो जिस तरह उतर प्रदेश से लेकर बिहार तक अपना दल की संभावनाएं तलाशने के लिए घुमे थे। वह किसी भी नए दल के लिए जरुरी होता है। यदि आपको राजनीति में स्थापित होना है तो यह तय करना पड़ेगा कि आपके पास संगठन हो। यदि आप संगठन से अधिक दिल्ली में आरामपरस्त डिबेट में हिस्सा ले रही है तो माफ़ करियेगा, आप जमीन पर संगठन नहीं बना सकती है।

अपने लोगों के मुद्दों की जितनी समझ नेता में होती है, उतनी मैनेजर में नहीं। नेता के गिरने के बाद मैनेजर की कोई औकात नहीं होती है। दरअसल मैनेजर परजीवी की तरह होता है, जो लीडर की हैसियत पर खड़ा होता है। जनता लीडर से मिलकर बात रखना चाहती है। जो लीडर अपनी भूमिका मैनेजर को दे देता है, जनता उससे दूर हो जाती है। जिन नेताओं में लीडरशिप देने की क्षमता और बौद्धिकता दोनों होती है, उसे बौद्धिकता की पहचान को दबा कर लीडरशिप की राह पर आगे निकलना चाहिए। चूँकि उतर प्रदेश और बिहार तो बौद्धिकता की पहचान वालों की राजनीति कब्र है। लीडरशिप देने का एक ही तरीका है, कि आप कितने दिन तक दिल्ली और कितने दिन तक गाँवों ने रहते है। दशकों तक उतर प्रदेश की ख़ाक छानने के बाद कोई मुलायम सिंह यादव, कांशीराम अथवा सोनेलाल पटेल होता है। सहम कर, परजीवी की तरह राजनीति करना दिवंगत सोनेलाल पटेल की प्रतिभाशाली वारिस को शोभा नहीं देता है।

अभी भी वक्त है। लीडरशिप देने के लिए तय करिए कि कितने दिन दिल्ली में रहना है, कितने दिन उतर प्रदेश के गाँवों में कस्बों में।  अपने समर्थक, वर्ग के प्रति ईमानदारी से बातें रखिये।  बातें रखने में निशाने पर यदि मोदी आये या योगी आये, मत हिचाकिये। अपनी जमीन तैयार कीजिये। पुराने समर्थकों को अपने साथ लाने के लिए हाथ भी जोड़ना पड़े तो गुरेज मत कीजिये। जनता के सामने सिर्फ झुकाने वाले ही मुकुटवरण के योग्य होते है। अनुप्रिया पटेल को जन्मदिन की कोटि-कोटि बधाई।

 



रिसर्च स्कॉलर, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद