शिवपुराण से....... (235) गतांक से आगे.......रूद्र संहिता (प्रथम सृष्टिखण्ड़)


शिवपूजन की विधि तथा उसका फल........


गतांक से आगे............
प्रातःकाल ब्रह्ममूर्त में उठकर गुरू तथा शिव का स्मरण करके तीर्थों का चिन्तन एवं भगवान विष्णु का ध्यान करें। फिर मेरा, देवताओं का और मुनि आदि का भी स्मरण चिन्तन करके स्तोत्र पाठपूर्वक शंकरजी का विधिपूर्वक नाम लें। उसके बाद शैया से उठकर निवास स्थान से दक्षिण दिशा में जाकर मलत्याग करें। मुने! एकान्त में मलोत्सर्ग करना चाहिए। उससे शुद्ध होने के लिए जो विधि मैंने सुन रखी है, उसी को आज कहता हूं। मन को एकाग्र करके सुनो।
ब्राह्मण गुदा की शुद्धि के लिए उसमें पांच बार शुद्ध मिट्टी का लेप करें और धोयें। क्षत्रिय चार बार, वैश्य तीन बार और शूद्र दो बार विधिपूर्वक गुदा की शुद्धि के लिए उसमें मिट्टी लगायें। लिंग में भी एक बार प्रयत्नपूर्वक मिट्टी लगानी चाहिए। तत्पश्चात बायें हाथ में दस बार और दोनों हाथों में सात बार मिट्टी लगाकर धोयें। तात! प्रत्येक पैर में तीन-तीन बार मिट्टी लगायें। फिर दोनों हाथों में भी मिट्टी लगाकर धोयें। स्त्रियों को शूद्र की ही भांति अच्छी तरह मिट्टी लगानी चाहिए। हाथ-पैर धोकर पूर्ववत शुद्ध मिट्टी लें और उसे लगाकर दांत साफ करें। फिर अपने वर्ण के अनुसार मनुष्य दतुअन करे। ब्राह्मण को बारह अंगुल की दतुअन करनी चाहिए। क्षत्रिय ग्यारह अंगुल, वैश्य दस अंगुल व शूद्र नौ अंगुल की दतुअन करें। यह दतुअन मन बताया गया। मनुस्मृति के अनुसार कालदोष का विचार करके ही दतुअन करें या त्याग दें। तात! षष्ठी, प्रतिपदा, अमावस्या, नवमी, व्रत का दिन, सूर्यास्त का समय, रविवार तथा श्राद्ध दिवस-ये दंतधावन के लिए वर्जित हैं।     (शेष आगामी अंक में)