शिवपुराण से....... (234) गतांक से आगे.......रूद्र संहिता (प्रथम सृष्टिखण्ड़)


शिवपूजन की विधि तथा उसका फल......


गतांक से आगे............
सूतजी बोले-मुनीश्वरो! आपने बहुत अच्छी बात पूछी है, परन्तु वह रहस्य की बात है। मैंने इस विषय को जैसा सुना है और जैसी मेरी बुद्धि है, उसके अनुसार आज कुछ कह रहा हूं। जैसे आप लोग पूछ रहे हैं, उसी तरह पूर्वकाल में व्यासजी ने सनत्कुमार जी से पूछा था। फिर उसे उपमन्युजी ने भी सुना था। व्यासजी ने शिवपूजन आदि जो भी विषय सुना था, उसे सुनकर उन्होंने लोकहित की कामना से मुझे पढ़ा दिया था। इसी विषय को भगवान् श्रीकृष्ण ने महात्मा उपमन्यु से सुना था। पूर्वकाल में ब्रह्माजी ने नारदजी से इस विषय में जो कुछ कहा था, वही इस समय मैं कहूंगा।
ब्रह्माजी ने कहा-नारद! मैं संक्षेप से लिंगपूजन की विधि बता रहा हूं, सुनो। जैसा पहले कहा गया है, वैसा जो भगवान् शंकर का सुखमय, निर्मल एवं सनातन रूप है, उसका उत्तम भक्तिभाव से पूजन करें, इससे समस्त मनोवांछित फलों की प्राप्ति होगी। दरिद्रता, रोग, दुःख तथा शत्रुजनित पीड़ा-ये चार प्रकार के पाप (कष्ट) तभी तक रहते हैं, जब तक मनुष्य भगवान् शिव का पूजन नहीं करता। भगवान् शिव की पूजा होते ही सारे दुख विलीन हो जाते हैं और समस्त सुखों की प्राप्ति हो जाती है। तत्पश्चात समय आने पर उपासक की मुक्ति भी होती है। जो मानव शरीर का आश्रय लेकर मुख्यतः संतानसुख की कामना करता है, उसे चाहिए कि वह सम्पूर्ण कार्यों और मनोरथों के साधक महादेव जी की पूजा करे। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र भी सम्पूर्ण कामनाओं तथा प्रयोजनों की सिद्धि के लिए क्रम से विधि के अनुसार भगवान् शंकर की पूजा करे।  (शेष आगामी अंक में)