मिथ्या अभिमान


कुंवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।


प्राचीन मिथिला देश में नरहन के राजा बड़े दयालु और विद्वान थे। वे सदा अपनी प्रजा के प्रति वात्सल्य भाव रखते थे। उनके राज्य में एक बहुत गरीब आदमी रहता था, जो सदा राजा की आलोचना और बुराई करता रहता था। राजा को यह बात भलीभाँति मालूम थी, लेकिन वह अकारण इस आलोचना के प्रति उपेक्षाभाव रखते थे। एक दिन राजा ने इस ओर गम्भीरता से। सोंचकर उस आदमी के प्रति दयाभाव दिखाते हुये गेंहूँ आटा के भरे बड़े बड़े मटके, वस्त्र धोने का क्षार, गुड़ की ढे़लियाँ, अपने सेवक द्वारा बैलगाड़ी पर लदवाकर उसके यहाँ भिजवाईं।  राजा से उपहार स्वरूप ये वस्तुयें पाकर वह व्याक्ति गर्व से फूला नहीं समाया और नादान सोंच बैठा कि राजा ने उससे डरकर ही ये वस्तुयें उसे भेजीं हैंc ऐसा सोंचता हुआ वह अभिमान में चूर राजगुरु के पास पहुँचा,और उन्हें सारा वृतान्त एक विजेता की भाँति बताया। राजगुरू उसके सारे हावभाव देखकर समझाते हुए बोले- हमारे राजा किसी की झूठी आलोचनाओं से नहीं डरते। इन उपहारों द्वारा राजा ने तुम्हें सार्थक सीख देने का प्रयास किया है, ताकि तुम हर समय उल्टी सीधी आलोचनाओं और निन्दा में रत ना रहो, बल्कि संतुष्ट रहो,शुभ चिन्तन करो और मधुर सम्भाषण भी कर लिया करो, लेकिन वह हठी व्यक्ति राजगुरू की सीख को भी नकार कर अपनी धुन में घमंड में चूर जा रहा था कि एक अंजान आदमी ने उससे कुछ पता पूँछा, लेकिन उसने अहंकारवश उसे अनसुना कर आगे बढ़ने वाला ही था कि उस अन्जान व्यक्ति ने गुस्से में उस गरीब किन्तु घमन्डी आदमी को जोर से धक्का दिया। वह कीचड़ में जा गिरा। उसे ऐसा लगा कि वह सातवें आसमान से नीचे आ गिरा हो।  सामने लम्बे चौडे़ गुस्सैल अन्जान व्यक्ति पर उसे मन ही मन क्रोध तो बहुत आया, पर डर के मारे चुप रहा। वह समझ गया था कि इससे उलझना अपनी शामत को बुलाना होगा।  आज उसे सही सब़क मिल गया था।


राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ