लाॅकडाउन: आज खुद को पा रही प्रकृति प्रसन्न है


डा.ममता भाटिया, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।


आज पूरी मानवता एक आपदा से जूझ रही है। इससे जुड़े सबक कलमबद्ध करते हुए मेरा ध्यान सबसे पहले प्रकृति के आगे मानव की तुच्छता पर जाता है। आज जब मनुष्य ने अपने जनजातियों पर आधिपत्य स्थापित कर प्रकृति के पालनहार को चुनौती दी, तो प्रकृति ने हस्तक्षेप कर उसे उसकी हैसियत दिखा दी।

चिड़ियों की चहचहाहट से आंख खुली तो बाहर खुले आसमान के स्वच्छ वातावरण, खुशबूदार हवाओं के गुणगुनाहट ने तरोताजा कर दिया। तभी रेडियो पर संतोष आनंद साहब के गीत के बोल ‘कुछ पाकर खोना है कुछ खोकर पाना है’ गुनगुनाते हुये महसूस हुआ कि यह पंक्तियां तो आज के समय को चरितार्थ करती हैं। लगा कि यह संदेश तो प्रकृति हम तक पहुंचा रही है। प्रकृति आज खुद को पा रही है, उसका खुद से मिलन हो रहा है, परंतु यह सब पाने के लिए उसे बहुत कुछ खोना पड़ रहा है।
21 दिन के लॉकडाउन में सभी अपने घरों में कैद हैं फैक्ट्री, कॉलेज, स्कूल-दफ्तर और परिवहन के सभी साधनों के बंद होने की वजह से मानो जिंदगी थम सी गई है, परंतु इन परिस्थितियों में सृष्टि, प्रकृति बहुत प्रसन्न है, क्योंकि लॉकडाउन से प्रकृति का रंग बदल रहा है, हवा स्वच्छ हो रही है, प्रदूषण लगातार कम हो रहा है, वायु परिवहन (हवाई जहाज) बंद होने से उसके पक्षी अब खुले आसमान में ऊंची उड़ान भर पा रहे हैं। प्रकृति प्रसन्न है कि जीव-जंतुओं को पिंजरे में बंद करने वाला शक्तिशाली प्राणी आज स्वयं पिंजरे में बंद है। प्रकृति प्रसन्न है कि आज उसके नदी-नाले, तालाब, समुद्र, पहाड़ सभी साफ-स्वच्छ हो रहे हैं। जो मानव करोड़ों रुपए लगाकर भी साफ नहीं कर पाया, इस लॉकडालन ने कर दिया। आज अप्रैल 2020 का एयर क्वालिटी इंडेक्स की तुलना अगर अप्रैल 2019 से करें तो पिछले साल की अपेक्षा इस साल एयर क्वालिटी इंडेक्स में जबरदस्त सुधार हुआ है। 7 अप्रैल 2020 को मेरठ का एक्यूआई 20 से लेकर 69 तक दर्ज किया गया जो स्वास्थ्य के लिये बहुत लाभप्रद है। वहीं गत वर्ष अप्रैल में यह 153 एक्यूआई था। लोग बताते हैं कि पंजाब के एक शहर से तो हिमाचल की धौलाधार घाटी साफ दिखाई दे रही है। यह नजारा लगभग 30 वर्ष बाद दिखाई दे रही है। वहीं रात में आसमान साफ होने से अब तारे भी दिखने लगे हैं।
प्रकृति मनुष्य की दुश्मन नहीं है। उसने तो पृथ्वी पर वन्यजीवों और अन्य प्रजातियों को पैदा कर सबको समानता का अधिकार दिया। सृष्टि की सभी सुविधाएं समान रूप से उपलब्ध करवाई। हमारे प्राचीन वैदिक साहित्य भी सभी जातियों को बराबर सम्मान देने के उदाहरण है। उसमें प्रकृति को महत्व एवं शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का दर्शन देखने को मिलता है, परंतु मनुष्य की तृष्णा और स्वार्थ की वजह से स्वार्थी मानव ने अन्य प्रजातियों पर अपना आधिपत्य जमा कर पूरी धरती पर नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया और अपनी परंपराओं, वेदों, उपनिषदों को भूल कर ऐसी आपदाओं को आमंत्रण दे दिया।  
संक्रमण रोग और महामारी मानव जाति के लिए कोई नई बात नहीं है। समय-समय पर आपदाएं और महामारी देकर प्रकृति ने कई बार मनुष्य को चेताया है, परंतु कोरोना वायरस से पैदा हुई महामारी कोविड-19 या इतने बड़े पैमाने पर कोरोना वायरस के इस प्रकोप ने मानव प्रजाति को प्रकृति के सामने असहाय कर दिया है। इससे पहले प्रकृति का ऐसा भयानक रूप हमने किभी ने नहीं देखा होगा। यह त्रासदी या आपदा बता रही है कि मानव ने प्रकृति में किस हद तक हस्तक्षेप किया है। कहते हैं ना कि जब भी सीधी उंगली से घी ना निकले तो उंगली टेढ़ी कर लेनी चाहिए, तो आज प्रकृति ने अपनी उंगली टेढ़ी कर ली है, ताकि मानव द्वारा किए गए असंतुलन को संतुलित किया जाए। प्रकृति आपदा देकर सबक सिखाया है कि उसके आगे मनुष्य असहाय है। जब प्रकृति विनाशकारी रूप लेकर सबक सिखाती है तो पूरी मानव जाति को एक सीख मिलती है। इस कठिन दौर में प्रकृति हमें कई सीख दे रही है-
साफ-सफाई और एकांतवास
सृष्टि ने मानव को इस महामारी के जरिए सफाई का संदेश दिया है जिसे हम भूल गए थे। जगह-जगह गंदगी के ढेर, जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण इत्यादि कर हम सफाई के महत्व को नहीं समझ पा रहे थे। हम जिस हवा में सांस लेते हैं और जो पानी पीते हैं, वह स्वच्छ होना चाहिए। इससे पहले भी सफाई की कमी के कारण प्लेग जैसी महामारी को हम झेल चुके हैं। प्लेग की रोकथाम के लिए एक स्वयंसेवी के रूप में महात्मा गांधी ने शौचालयों की स्थिति देखी और लोगों को प्रेरित किया कि वे स्वच्छता पर अधिक से अधिक ध्यान दें। तो स्वच्छता ही कोरोना वायरस को समाप्त करने का सर्वोत्तम उपाय है। स्वच्छता को बनाए रखने के लिए शारीरिक दूरी की सलाह दी गई। एकांतवास में रहकर ही हम एक दूसरे अस्वच्छ और संक्रमित व्यक्ति से बच सकते हैं।
समानता
प्रकृति इस संकट में हमें यह स्मरण कराना चाहती है कि हमें समानता और पूरी विनम्रता के साथ मूलभूत जीवन मूल्यों को स्वीकार करना होगा। इस समय प्रत्येक वैश्विक नागरिक को प्रकृति का सक्रिय योद्धा बनना है ताकि पृथ्वी पर मनुष्य और अन्य जीव जातिया सौहार्दपूर्ण सहअस्तित्व का आनंद ले सकें। परंतु विश्व समुदाय के लिए समानता मायने नहीं रखती। प्रकृति ने यह संदेश बार-बार दिया कि वह जाति, पंथ, क्षेत्र या अन्य किसी मानव निर्मित भेदभाव को नहीं मानती। इसके लिए सभी बराबर हैं। परंतु मानव के ना समझने पर प्रकृति ने यह जता दिया कि उसकी छोटी सी अदृश्य रचना कोरोना वायरस जाति, पंथ, क्षेत्र या मानव निर्मित भेदभाव नहीं मानता। जानलेवा कोरोना वायरस राजा और रंक या किसी देश अथवा धर्म का लिहाज नहीं करता। उसके लिए सभी बराबर हैं। एक देश के बाद दूसरे देश में पैठ बनाकर इसने पूरी दुनिया को हरा दिया है। कोरोना वायरस के खिलाफ हमारी सामूहिक ताकत की असमर्थता ने मानवीय क्षमताओं की बड़ी-बड़ी धारणाओं की धज्जियां उड़ा दी है।
प्रकृति का दोहन
प्राकृतिक चीजों से मानव का खिलवाड़ लंबे समय से चल रहा है। सृष्टि के सभी भंडारण को मनुष्यों ने केवल अपने लाभ के लिए खरोंच-खरोंच कर निकाल लिया है। उसे जो नहीं करना चाहिए था, वही सब लगातार कर रहा है। प्रकृति भी लगातार काफी समय तक खतरनाक गैसों, रासायनिक अपशिष्ट, जंगल, भूमि कटान, प्रदूषण इत्यादि को अपने दामन में छुपाती रही और हर दिन हर पल घुटती रही। हमने अपने स्वार्थ के कारण प्रकृति का इतना दोहन कर लिया कि उसने हस्तक्षेप कर इंसान को उसकी हैसियत दिखा दी और यह त्रासदी देकर बता दिया कि अति तो हर चीज की बुरी है। आज पूरी दुनिया मनुष्यों के द्वारा की गई गलतियों के विनाशकारी प्रभाव को सहन कर रही है।
वसुधैवकुटुंबकम
यह कथन आज के समय में एकदम सार्थक है। महामारी के आने से हमें फिर से वसुधैवकुटुंबकम का संबोधन याद आ गया जिसका अर्थ है- पूरा विश्व एक परिवार है। प्रकृति ने इस महामारी से यह संदेश दिया है कि पूरे विश्व को आपसी भेदभाव छोड़कर केवल और केवल इंसानियत का रिश्ता बनाना होगा। जहां हर व्यक्ति एक दूसरे के साथ गहराई से जुड़ा हो तभी सुरक्षित है इस महामारी के समय में सभी देश एकजुट होकर खड़े हैं पूरी दुनिया कोविड-19 महामारी के खिलाफ एक साथ संघर्ष कर रही है भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी देशों के प्रशासनिक अधिकारियों से बातचीत कर इस समस्या से सुलझने से सुनने के लिए विचार-विमर्श भी किया है ताकि इस घड़ी में सब एक दूसरे के साथ हूं और एकजुट होकर इस समस्या को सुलझा सकें।
स्वार्थीपन
मनुष्य हमेशा से स्वार्थी रहा है। यह त्रासदी हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारा स्वार्थीपन हमें इस संकट से निकाल पाएगा? हमारे रक्षक, हमारे कोरोना वायरस योद्धा जैसे डॉक्टर, नर्सेस, सफाईकर्मी, दवा विक्रेता, सेना, पत्रकार-मीडियाकर्मी इत्यादि अगर स्वार्थी हो जाएं तो क्या हमारा जीवन बच पाएगा? कदापि नहीं। इस समय हमें इनके साथ सहयोग करना होगा। जो अपने जीवन को जोखिम में डालकर मानव जाति की सेवा कर रहे हैं। हम में से हर एक को गंभीर संकट की इस घड़ी में अपना कर्तव्य निभाना होगा। हम घर में रहकर ही कई तरीके से सहायता कर सकते हैं। जागरूकता बढ़ाने और घबराहट से बचने बचाने में प्रत्येक नागरिक अपनी परिपक्वता और समझदारी का परिचय दे सकता है।
प्रकृति का सम्मान
हम याद करें कि कैसे हमारे पूर्वज प्रकृति को मां का दर्जा देते थे। उन्होंने सदैव प्रकृति का सम्मान करने की शिक्षा दी। आज भी जब यज्ञ होते हैं तो सर्वप्रथम भूमि को पूजा जाता है लेकिन हम उनके दिखाये मार्ग से हट गए और प्रकृति के पालनहार को लगातार चुनौती देते रहे। जिसका खामियाजा आज हम भुगत रहे हैं।
पृथ्वी के इतने सबक और सीख के बावजूद क्या हम एकांतवास के इस चुनौतीपूर्ण दौर में यह महसूस कर पाएंगे कि प्रकृति कैसी है और हमने इसके साथ क्या कर दिया? क्या यह चेतना सिर्फ लाॅकडाउन तक रहेगी या फिर कोविड-19 के संक्रमण से उबरने के बाद हम अपनी प्रकृति को बेहतर बना लेंगे? समय आ गया है कि हम फिर से प्रकृति की इस अलार्म को चुनौती की तरह स्वीकार करें और उसके द्वारा दिए गए संदेशों को समझें और इसी तरह प्रकृति को प्रसन्न रहने दें।


विभागाध्यक्ष, पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग, विद्या नाॅजेल पार्क, मेरठ