सहनशील

(कुंवर आर.पी.सिंह), शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

 

एक रात एक चित्रकार ने सपना देखा कि वह थककर एक पेड़ के नीचे छाँव में पत्थर के टुकड़े पर बैठा आराम कर रहा है। उसके आसपास और भी पत्थर पड़े हुए थे। खाली बेमन उसने एक पत्थर उठा लिया और फिर ना जाने क्या सोंचकर अपने औजारों के थैले से छेनी हथौड़ी निकालकर उस पत्थर पर जैसे ही पहली चोट की, कि पत्थर चिल्ला उठा-मुझे मत मारो। मूर्तिकार ने विस्मय से दूसरी चोट की, वह पत्थर रोने लगा। उसने उस पत्थर को एक नीचे रख दिया। फिर मूर्तिकार ने अपनी पसन्द एक दूसरा पत्थर उठा लिया और उसे तरासने लगा। यह पत्थर चुपचाप सब वार सहता गया और देखते ही देखते उससे एक देवी की मूर्ति बन गयी।

मूर्तिकार देवी मूर्ति को वहीं पेड़ के पास रखकर वहाँ से आगे गन्तव्य को चला गया। कुछ समय बाद वह उसी पुराने रास्ते से वहाँ से गुजरा। उस स्थान पर पहुँचकर उसने देखा कि खूब भीड़ लगी हुई है और भजन कीर्तन करते लोग उस मूर्ति की पूजा अर्चना कर रहे हैं, जो उसने बनायी थी। 

जब उसके दर्शन का नम्बरआया तो पास जाकर उसने देखा कि उसकी बनायी मूर्ति के पास ना जाने क्या क्या चढ़ावे के फल, फूल, मिठाई इत्यादि प्रसाद रखे हैं। वहीं कुछ दूर वह चोट लगने पर रोने वाला पत्थर पड़ा था, जिस पर लोग नारियल फोड़ फोड़कर देवी मूर्ति पर चढ़ा रहे थे। तभी मूर्तिकार की नींद खुल गई। उसने सपने के बारे में सोंचा और इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि जो लोग थोड़ा कष्ट सह लेते हैं या परिश्रम करते हैं, उनका जीवन बन सँवर जाता है। दुनिया उनका सम्मान करती है और जो लोग कष्ट या परिश्रम से डर जाते हैं वे बाद में कष्ट झेलते हैं और लोग उनका सम्मान भी नहीं करते।

 



राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ