पागलपन का भूत (लघुकथा)


 मुकेश कुमार ऋषि वर्मा, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

क्षेत्र के जाने-माने विधायक जी को पागलपन के दौरे पड़ने लगे हैं। जब यह बात क्षेत्रवासियों को पता चली तो उनमें मायूशियत फैल गई। सभी ने मिलकर ईश्वर से प्रार्थना की प्रभु ! हमारे विधायक जी को अतिशीघ्र स्वस्थ कर दें। खासकर विधायक जी की जाति वालों ने लंबी पूजा अर्चना की, क्योंकि एक विधायक जी ही थे उनके पालनहार। वैसे कोरा भ्रम था उनकी बिरादरी वालों का।
एक चाय की दुकान पर चर्चा चल रही थी कि फलां आदमी किसी रुके पड़े कार्य को संपन्न कराने के वास्ते विधायक जी के पास प्रार्थना पत्र लेकर गया, परन्तु विधायक जी ने दे कुर्सी- दे कुर्सी उसका खूब तबियत भर  स्वागत -सत्कार किया। लोग बतिया रहे थे कि चुनाव के समय में अमुक व्यक्ति ने विधायक जी का खूब प्रचार किया और थैला (झोला) भर कर चढ़ावा भी दिया था।
देखते ही देखते विधायक जी का डर सिर्फ उनकी ही बिरादरी वालों में फैल गया, क्योंकि विधायक जी पर पागलपन का भूत तभी आता, जब उनके पास स्वयं उनकी बिरादरी के लोग गिड़गिड़ाने पहुंचते थे। बाकी समय वे सामान्य रहते थे और विभिन्न समाजों का बढ़-चढ़ कर विकास भी कर रहे थे। अब लोग समझ चुके थे कि राजनीति में जाति -बिरादरी देखकर वोट करना कितना दुखदाई हो सकता है।
ग्राम रिहावली, डाक घर तारौली गुर्जर, फतेहाबाद, आगरा, उत्तर प्रदेश