अन्तर्राष्ट्रीय मानवतावादी दिवस (19 अगस्त) पर विशेष
डा0 जगदीश गांधी, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। अन्तर्राष्ट्रीय मानवतावादी दिवस लोगों में मानवता की भावना जगाने तथा उसे और भी अधिक विकसित करने के महान उद्देश्य के साथ शुरू किया गया है। दिसम्बर 2008 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने 19 अगस्त को ‘विश्व मानवतावादी दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया था। संयुक्त राष्ट्र संघ के बगदाद (इराक) में आफिस पर आतंकवादी हमले में 19 अगस्त, 2003 को 22 लोग मारे गए थे। अन्तर्राष्ट्रीय मानवता दिवस विश्व के उन सभी लोगों को एक श्रद्धाजंलि थी जिन्होंने अपना जीवन मानवता की राह पर चलते हुए विश्व को समर्पित कर दिया। मानव जाति के लिए अपने जीवन का बलिदान करने वाले भारत सहित विश्व के सभी मानवतावादियों को हम शत-शत नमन् करते हैं। मानवता एक ऐसा शब्द है जिसकी परिभाषा बहुत ही व्यापक है। आज विश्व का हर देश मानवीय संवेदना की निरन्तर कमी की वजह से कराह रहा है। विश्व के कई हिस्सों में मानवता का निरंतर क्षय हो रहा है। अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद के तहत अफगानिस्तान में चुनी हुई सरकार के लिए आतंकी गतिविधियों ने संकट पैदा कर दिया है। अभी हॉल ही में अफगानिस्तार के स्टार क्रिकेटर राशिद खान ने अफगानिस्तान में शांति की अपील करते हुए दुनियाँ के नेताओं से कहा कि वे हिंसा के बीच उनके देश को ‘‘अराजकता’’ में न छोड़ें। राशिद ने सोशल मीडिया पर लिखा, ‘प्रिय विश्व नेताओं! मेरा देश अराजकता में है, बच्चों और महिलाओं सहित हजारों निर्दाेष लोग हर रोज शहीद हो जाते हैं, घर और संपत्ति नष्ट हो जाती है। हजारों परिवार विस्थापित हो जाते हैं। हमें अराजकता में मत छोड़ो। अफगानों को मारना और अफगानिस्तान को नष्ट करना बंद करो हम शांति चाहते हैं। एशिया और अफ्रीका के कई हिस्सों में इस समय करोड़ों लोग भूखमरी और गंभीर अकाल की वजह से पीडित हैं। इनमें से सबसे बुरी हालत महिलाओं और अबोध बच्चों की है। हालत इतने गंभीर हैं कि संयुक्त राष्ट्र संघ भी सभी पीड़ितों की मदद करने में खुद को असहाय पा रहा है। अफ्रीका ही नहीं विश्व के कई अन्य हिस्सों में समाज को मानवता की जरूरत है। आज जहाँ भी प्राकृतिक आपदाएँ या कोई अन्य घटनायें होती है तो सबसे पहले लोग आसपास की जनता से मानवता के नाते मदद की आस रखते हैं। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) और विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्ल्यूएफपी) की रिपोर्ट में कहा गया है, अगर जीवन और आजीविका बचाने के लिए तत्काल सहायता नहीं दी जाती है, तो दुनिया भर में कुल 4.1 करोड़ लोगों के सामने भुखमरी या अकाल जैसी स्थिति का खतरा है। आज की बाल एवं युवा पीढ़ी के साथ ही आगे जन्म लेने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित भविष्य देना संसार के सभी राष्ट्रों का प्रथम कर्तव्य एवं दायित्व है। क्योंकि आज के बच्चे ही कल उस देश के साथ ही सारे विश्व के भाग्य निर्माता बनेंगे। आज 4 में से 1 बालक गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा, बढ़ती हुई हिंसा, असुरक्षा और भेदभाव का शिकार हैं। 11 सितम्बर 2001 को हुए न्यूयार्क के वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर पर आतंकवादी हमले के पश्चात् अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद आज मानव सभ्यता का सबसे घातक शत्रु बन गया है। अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद पूरे संसार में फैली अराजकता का ही दुष्परिणाम है। यह एक ऐसी गम्भीर स्थिति है जहाँ लोग हिंसात्मक और विध्वंसकारी गतिविधियों द्वारा अपनी शिकायतों या दुखों का काल्पनिक समाधान खोजते हैं और इनके लिए वे व्यवस्था को दोषी ठहराते हैं।
आज की बिगड़ी हुई सामाजिक परिस्थितियों में बदलाव लाने के लिए बच्चे ही सबसे सशक्त माध्यम हैं। बच्चों की सुरक्षा के विषय में सभी देश एकमत हैं। युद्धोन्माद में डूबी विश्व के अधिकांश देशों की सरकारों का ध्यान मैं इस सच्चाई की ओर लाना चाहता हूं। जो इस प्रकार हैं - संसार भर में 10 करोड़ से अधिक बच्चे कठिन और खतरनाक परिस्थितियों में काम करने के लिए बाध्य किये जाते हैैं। इनमें से कई बंधुआ मजदूर की तरह वेतन रहित कार्य करते हैं। 100 करोड़ से अधिक लोगों के पास या तो कोई घर नहीं है या फिर उन्हें बहुत ही अमानवीय परिस्थितियों में अपने बच्चों के साथ रहना पड़ रहा है। पूरे संसार में एक करोड़ से अधिक बाल शरणार्थी हैं। शरणार्थी कैम्पों में कुपोषण से पीड़ित ये बच्चे अपने माँ-बाप से अलग होकर सारी जिन्दगी बन्द रिफ्यूजी कैम्पों में गुजार देते हैं। जिन्हें चारों ओर से बन्दूकें और काँटेदार तार की बाड़े घेरे रहती हैं। विश्वव्यापी समस्याओं को विश्व स्तर के समाधानों की आवश्यकता है। विश्वव्यापी समाधानों के अभाव के कारण विश्व स्तर की समस्यायें और अधिक जटिल और गूढ़ होती जा रही हैं और सारी मानव जाति को उलझाती जा रही हैं। कोरोना महामारी, अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद, ग्लोबल वार्मिंग, परमाणु शस्त्रों की बढ़ती होड़, युद्ध, कानूनविहीनता, कुपोषण, महामारी, भूख आदि विश्वव्यापी समस्याओं से संसार के लगभग दो अरब तथा चालीस करोड़ बच्चों के साथ ही आगे जन्म लेने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए प्रभावशाली एवं विश्वव्यापी प्रयासों की आज अविलम्ब आवश्यकता है। जिसके लिए सभी देशों की आपसी सहमति से विश्व सरकार का गठन ही इसका एकमात्र समाधान है। प्रत्येक राष्ट्र के लिए अपने देश के बच्चों का सुरक्षित भविष्य सबसे प्रमुख मुद्दा है। इसलिए सभी राष्ट्रों के मामले में भी विश्व के दो अरब तथा चालीस करोड़ बच्चों का सुरक्षित भविष्य सबसे सर्वमान्य मुद्दा तथा चिन्ता का विषय है। प्रभावशाली अन्तर्राष्ट्रीय कानून की डोर से विश्व के राष्ट्रों को बांधकर एकताबद्ध किया जा सकता है। संसार को एकताबद्ध करके युद्धरहित बनाया जा सकता है। ऐसे होने से प्रत्येक राष्ट्र द्वारा अपनी सुरक्षा के नाम से होने वाले रक्षा बजट तथा मानव संसाधन को बचाकर प्रत्येक व्यक्ति के लिए रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, चिकित्सा आदि की अच्छी व्यवस्था करने में लगायेगा जिससे सारे विश्व में शांति एवं खुशहाली आ जायेगी। शान्ति प्रिय देश भारत ही अपनी उदार संस्कृति, स्वर्णिम सभ्यता तथा अनूठे संविधान के बलबूते सारे विश्व में शान्ति स्थापित कर सकता है। भारत के पास अपनी प्राचीन एवं महान संस्कृति ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का आदर्श तथा विश्व का सबसे अनूठा संविधान है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 में अन्तर्राष्ट्रीय कानून का सम्मान करने तथा विश्व एकता के लिए कार्य करने के लिए भारत के प्रत्येक नागरिक तथा राज्य को बाध्य किया गया है। ऐसे में सारे विश्व में एकता एवं शांति स्थापित करने के लिए भारत को ही आगे आना होगा। वास्तव में अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद जैसी विश्वव्यापी समस्याओं को केवल अन्तर्राष्ट्रीय कानून के द्वारा ही नियंत्रित किया जा सकता है, युद्धों के द्वारा नहीं। इसलिए आज जरूरत इस बात की है कि एक विश्वव्यापी न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के लिए विश्व के सभी देश बिना किसी मतभेद के एक मंच पर इकट्ठे होकर संयुक्त राष्ट्र संघ को एक शक्तिशाली विश्व संसद के रूप में गठन करें। इसके लिए भारत को विश्व के सभी देशों से परामर्श करके उन्हें विश्व संसद, विश्व सरकार तथा विश्व न्यायालय के शीघ्र गठन के लिए सहमत करना चाहिए। संस्थापक-प्रबन्धक, सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ