थोड़ा सा




प्रीति शर्मा "असीम", शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

 

आओ! थोड़ा जी लेते हैं।

जीवन विष का प्याला है।

अमृत कर के पी लेते हैं।

 

मौत तो आनी है ,

एक दिन 

उससे पहले, 

आओ थोड़ा जी लेते हैं।

 

कितना खुद को,

मारा पल- पल।

जीवन में सब ,

हारा पल -पल।

जो बचा हुआ है, 

उसको हाथों में भरकर।

 

सारी तमन्नायें पी लेते हैं ।

आओ थोड़ा जी लेते हैं।

 

किसका था इंतजार हमें ।

क्या पाया जीवन का सार ...प्रिय

दिन आते- जाते रहते हैं।

सार्थक भी निरर्थक हो रहते हैं। 

फिर क्यों भागम- भाग .....प्रिय ।

 

हम शून्य हुए जाते हैं।

मर- मर कर जिए जाते हैं। 

आओ थोड़ा सा ,

सच में जी लेते हैं।

जीवन विष को ,

अमृत कर पी लेते हैं।

 

 नालागढ़ हिमाचल प्रदेश









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