शिवपुराण से....... (243) गतांक से आगे.......रूद्र संहिता (प्रथम सृष्टिखण्ड़)


भगवान् शिव की श्रेष्ठता तथा उनके पूजन की अनिवार्य आवश्यकता का प्रतिपादन .........


गतांक से आगे............


नारदजी बोले-ब्रह्मन्! प्रजापते! आप ध्न्य हैं, क्योंकि आपकी बुद्धि भगवान् शिव में लगी हुई है। विधे्! आप पुनः इसी विषय का सम्यक् प्रकार से विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये।
ब्रह्माजी ने कहा- तात् एक समय की बात है, मैं सब आरे से ट्टषियों तथा देवताओं को बुलाकर उन सबको क्षीरसागर के तट पर ले गया, जहां सबका हित साध्न करने वाले भगवान् विष्णु निवास करते हैं। वहां देवताओं के पूछने पर भगवान् विष्णु ने सबके लिए शिवपूजन की ही श्रेष्ठता बतलाकर यह कहा कि एक मुहूर्त या एक क्षण भी जो शिव का पूजन नहीं किया जाता, वही हानि है, वही महान् छिद्र है, वही अंधपन है और वही मूर्खता है। जो भगवान् शिव की भक्ति में तत्पर है, जो मन से उन्हीं को प्रणाम और उन्हीं का चिन्तन करते हैं, वे कभी दुख के भागी नहीं होते। 
भवभक्तिपरा ये च भवप्रणतस्मरणा। ये च न ते दुःखस्य भाजना।।
जो महान सौभाग्यशाली पुरूष मनोहर भवन, सुन्दर आभूषणों से विभूषित स्त्रियां जितने से मन को संतोष हो उतना धन, पुत्र-पौत्र आदि संतति, आरोग्य, सुन्दर शरीर, अलौकिक प्रतिष्ठा, स्वर्गीय सुख, अन्त में मोक्षरूपी फल अथवा परमेश्वर शिव की भक्ति चाहते हैं, वे पूर्वजन्मों के महान् पुण्य से सदाशिव की पूजा अर्चना में प्रवृत्त होते हैं।


(शेष आगामी अंक में)