वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप जयंती 25 जून पर विशेष

डॉ. राजेश कुमार शर्मा"पुरोहित", शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

 

वीर प्रसूता धरती राजस्थान के शूरवीर महाराणा प्रताप ने अपनी मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए पूरा जीवन बलिदान के इतिहास में अपना नाम अंकित करा दिया था। एक सच्चे राजपूत, शूरवीर, देशभक्त ,योद्धा, मातृभूमि का रखवाला प्रताप अमर हो गया। महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया का जन्म ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया रविवार विक्रम संवत 1527 यानि 9 मई 1540 को हुआ था। उदयपुर मेवाड़ में सिसोदिया राजपूत राजवंश के राजा थे। प्रताप का नाम इतिहास में वीरता और दृढ़ प्रण के लिए अमर है। उन्होंने बादशाह अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की। कई वर्षों तक संघर्ष किया। महाराणा प्रताप ने मुगलों को कई बार युद्ध मे परास्त किया।

उनका जन्म वर्तमान राजस्थान के कुम्भलगढ़ दुर्ग पाली राजथान में हुआ था। इनके पिता उदय सिंह व मत राणी जयवंत कँवर थी। राजपूत समाज का वीर योद्धा के नाम से प्रसिद्ध हुए। महाराणा प्रताप का प्रथम राज्याभिषेक 28 फरवरी 1572 को गोगुन्दा में  हुआ था, लेकिन विधि विधान स्वरूप राणा प्रताप का द्वितीय राज्याभिषेक 1572 में कुम्भलगढ़ दुर्ग में ही हुआ। इस राज्याभिषेक में जोधपुर के  राठौड़ शासक राव चन्द्रसेन भी शामिल हुए। महाराणा प्रताप ने अपने जीवन मे 11 शादियां की।

मुगल सम्राट अकबर बिना युद्ध के प्रताप को अपने अधीन लाना चाह रहा था, इसलिए अकबर ने प्रताप को समझाने के लिए चार राजदूत नियुक्त किये थे। इन चारों के नाम जलाल खां, मानसिंह, भगवानदास, राजा टोडरमल थे। ये चारों प्रताप को समझाने गए, परन्तु निराश होकर इनको लौटना पड़ा। इस तरह 1572 से 1573 तक समझाने का क्रम जारी रखा, लेकिन जब प्रताप ने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं कि तब हल्दीघाटी का ऐतिहासिक युद्ध शुरू हुआ।

यह युद्ध 18 जून 1576 को मेवाड़ तथा मुगलों के मध्य हुआ था। इस युद्ध मे प्रताप की तरफ से एकमात्र मुस्लिम सरदार हकीम खां सूरी युद्ध लड़ा था। 1576 में हल्दीघाटी के महासंग्राम में 500 भील लोगो को साथ लेकर महाराणा प्रताप ने आमेर के सरदार राजा मानसिह के 80, 000 की विशाल सेना का सामना किया था। इस युद्ध मे भील सरदार राणा पुंजा का योगदान प्रशंसनीय रहा था। जब प्रताप शत्रु सेना से पूर्ण रूपेण घिर चुके थे, तब राजा मान सिंह ने अपने प्राण देकर उन्हें बचाया था और महाराणा को युद्धभूमि छोड़ने के लिए बोला था। शक्ति सिंह ने अपना अश्व देकर प्रताप को बचाया था। प्रिय अश्व चेतक की मृत्यु हो गई थी। इस एक दिन के युद्ध मे 17,000 लोग मारे गए थे। दिल्ली के बादशाह अकबर ने मेवाड़ फतह करने के लिए भरसक प्रयास किये। महाराणा प्रताप की हालात दिन प्रतिदिन चिंताजनक होती गई। 25000 सैनिकों के 12 सालों तक गुजारे के लिए उन्हें भामाशाह ने मदद की थी। 

महाराणा प्रताप के दो पुत्र अमर सिंह व भगवान दास थे, जब महाराणा प्रताप जंगल मे रहते थे, तब जंगल मे एक दिन वन बिलाव आया और पुत्र अमरसिंह से घांस की रोटी छीनकर ले गया। अमरसिंह तब छोटा बच्चा था।

अरे घांस री रोटी ही जब बन बिलावड़ो ले भाग्यो।

नान्हा सो अमर्यो चीख पड्यो सूती सी हूण जगावन में।

महाराणा प्रताप ने सुंगा पहाड़ पर एक बावड़ी का निर्माण कराया था। सुन्दर बगीचा लगवाया था। महाराणा की सेना में एक राजा तीन राव सात रावत 15000 अश्वरोही 100 हाथी 20000 पैदल 100 वाजित्र थे। इतनी बड़ी सेना के लिए प्रतिदिन खाद्यान की व्यवस्था प्रताप स्वयं करते थे। फिर ऐसी घटना घटी प्रताप को घांस की रोटी खानी पड़ी। अपने जीवन के अंतिम 12 सालों में प्रताप ने मेवाड़ को सुशासन दिया था। प्रताप ने दिवेर का युद्ध 1582 मे किया था। प्रताप ने खोये हुए राज्यों की पुनः प्राप्ति की। इसे मेवाड़ का मैराथन कहा गया।

1579 से 1585 तक उत्तरप्रदेश बंगाल बिहार गुजरात के प्रदेशो में विद्रोह हुआ प्रताप ने एक के बाद एक कई गढ़ जीते थे। 1585 में मेवाड़ मुक्ति के प्रयास तेज किये और  उदयपुर सहित 36 महत्वपूर्ण स्थानों पर प्रताप ने अधिकार जमा लिया। महाराणा प्रताप ने जब सिंहासन ग्रहण किया। उस समय जितने मेवाड़ की भूमि पर उनका अधिकार था। पूर्ण रूप से उतने ही भूमि भाग पर अब उनकी सत्ता फिर से स्थापित हो गई थी। इस प्रकार 1585 में  मुगलों के ग्रहण का मेवाड़ में हमेशा के लिए अंत हो गया। प्रताप फिर से उनके राज्य की सुख सुविधा के काम मे लग गए। महाराणा प्रताप के डर से  बादशाह अकबर अपनी राजधानी लाहौर लेकर चला गया था और प्रताप के स्वर्ग सिधारने के बाद आगरा ले आया था।

अकबर व प्रताप की लड़ाई सिद्धांतो और मूल्यों की लड़ाई थी। अकबर क्रूरता से साम्राज्य का विस्तार करना चाहता था और प्रताप देशभक्ति मातृभूमि की स्वधीनता के लिए संघर्ष कर रहे थे। अकबर भी ह्रदय से प्रताप का बड़ा प्रशंसक था। वह जानता था कि इस धरती पर प्रताप जैसा कोई वीर नहीं है। उसकी आँखों से आंसू आ गए थे जब प्रताप के स्वर्गवास की खबर सुनी। वह लाहौर में था। आज भी यह गाथा है कि-

माई एहड़ा पूत जण जेहड़ा राणा प्रताप।

अकबर सुतो ओधके ,जाण सिराणे सांप

आज प्रताप की जीवनी से सीख लेकर परिश्रम व लगन से सफ़लता हांसिल की जा सकती है। विपत्ति में धैर्य से काम लेकर व्यक्ति को मातृभूमि की रक्षा के लिए संघर्ष करते रहना चाहिए।


कवि, साहित्यकार भवानीमंडी, राजस्थान