मेरा शिमला टूर (भाग दो) मंजिल से भी सुहाना था सफर


हवलेश कुमार पटेल, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।


पिछले अंक में आपने पढ़ा था कि हम सब हिमालयन क्वीन ट्रेन में अपनी-अपनी सीट पर काबिज हो गये और ट्रेन ने रेंगते हुए सराय रोहिल्ला स्टेशन छोड़ दिया। अब हमारे ग्रुप के साथियों को कुछ परेशानी होने लगी थी, क्योंकि उनकी सीट कुछ दूर थी। इस समस्या का निदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई प्रवीन कुमार ने। उन्होंने सहयात्रियों से निवेदन कर सीटों की अदला-बदली कर ली। इस तरह टूर के सभी साथी एक साथ हो गये। इससे सफर और अधिक मनोरंजक हो गया। ट्रेन सौभाग्य से अपनी निर्धारित समय सुबह 8.35 बजे ही प्रस्थान कर चुकी थी, जिस कारण वह 46 किलोमीटर का सफर तय करके लगभग 6.30 बजे सोनीपत जाकर रूकी। खैर वहां कुछ विशेष नहीं था और दिन भी पूरी तरह नहीं निकला था सो सभी लोग ऊंघत रहे और ट्रेन ने फिर से अपनी रफ्तार पकड़ ली और गन्नौर व समालखा होते हुए हमारी ट्रेन पानीपत पहुंच चुकी थी।



इतिहास में पानीपत के बारे में वहां हुए घमासान युद्ध के बारे पढ़ चुके कुछ बच्चों के मन में पानीपत देखने की प्रबल इच्छा थी, मगर यह सब मुमकिन नहीं, लेकिन हमने पानीपत स्टेशन पर उतरकर फोटो अवश्य लिए, क्योंकि वहां ट्रेन का स्टोपेज अधिक समय का था। इसके बाद घरौंदा, करनाल, निलोखरी होते हुए लगभग 9 बजे 158 किलोमीटर का सफर तय करके कुरूक्षेत्र पहुंच चुकी थी। कुरूक्षेत्र का नाम क्योंकि सभी ने अपनी पाठ्यपुस्तकों में पढ़ा था और विश्व का सबसे चर्चित वे ऐतिहासिक महाभारत युद्ध यहीं लड़ा गया था, तो इस जगह को देखने के लिए सभी के मन मे उत्सुकता थी। अभी हम लोग अपने मन की उत्सुकता को जाहिर भी नहीं कर पाये थे कि ट्रेन अपने दो मिनट के स्टाॅपेज के बाद पुनः अपनी मंजिल की ओर चल पडी। खैर ट्रेन शाहबाद मारकंडा, अम्बाला कैंट, चंडडीगढ़, चंड़ीमन्दिर होते हुए 270 किलोमीटर का सफर तय करके अपने नियत टाईम 11.15 बजे कालकाजी पहुंच गयी। 



कालकाजी पहुंचकर जैसे ही हम लोग ट्रेन से उतरे तो सबसे पहले टाॅय ट्रेन की ओर दौड़े। टाॅय ट्रेन का रोमांच इस तरह सभी को लुभा रहा था कि खाने-पीने का किसी को ध्यान ही नहीं रहा। हालांकि टाॅय ट्रेन के छूटने से काफी समय पूर्व ही पहुंच गये थे,  लेकिन पास जाकर देखा तो वहां भीड़ का आलम यह था कि हमारे तो होश ही उड़ गये। इसके बावजूद हमने बुकिंग विंडो से टिकट लेना चाह था तो बुकिंग क्लर्क ने कहा कि पहले टाॅय ट्रेन में सीट का इंतजाम कर लो, इसके बाद टिकट ले लेना। बदकिस्मती से टाॅयट्रेन से शिमला जाना हमारी किस्मत में नहीं था। इस ट्रेन मे पैर रखने की जगह भी नहीं थी और ये आखिरी ट्रेन थी। 



खैर! अब हम लोगों को खाने की याद आयी और कालकाजी स्टेशन पर ही घर से साथ लाये खाना ही सबने खाया। इसके बाद शिमला जाने के लिए विकल्पों की तलाश होने लगी, तभी स्टेशन के बाहर मौजूद टैवलिंग एजेंट से बात करके एक टैम्पो ट्रैवलर को 4500 रूपये में तय करके सभी उसमें सवार हो गये। और शुरू हो गया कालकाजी से शिमला का सफर। बच्चों ने अपना म्यूजिक सिस्टम चालू कर दिया और गानों की धुन पर झूमते हुए शिमला की ओर चल दिये। उस समय ऐसा लग रहा था, जैसे सफर मंजिल से भी सुहाना हो। अभी हमारा सफर आधा भी हुआ था कि हमारे ट्रुप के छोटे सदस्य आयुष का जी मितलाने लगा और उसने उल्टी कर दी। इसके बाद कई अन्य सदस्य का जी भी मितलाने लगा। हम लोगों इसका पूर्वाभास था, इसलिए इसकी तैयारी पहले से ही कर रखी थी। साथ लायी हुई दवाई और हिंगोली आदि की गोली खाने को दी। हालांकि इसका कुछ फायदा नहीं हुआ, लेकिन किसी अन्य को फिर उल्टी नहीं हुई, लेकिन पहाड़ों के घुमावदार रास्तों के कारण कई लोगों का जी खराब होने लगा था। स्थिति को भांपते हुए टैम्पो ट्रेवलर के ड्राइवर ने लगभग डेढ़-पौने दो घंटे के सफर के बाद सोलन से आगे एक उपयुक्त जगह देखकर गाड़ी रोक ली। सबकी जान में जान आयी। वहां सभी ने चाय पी और लगभग आधे घंटे के विश्राम के बाद फिर से सफर शुरू हुआ और आखिर में लगभग तीन घंटे के सफर के बाद हम लोग अपने गंतव्य यानी शिमला पहुंच ही गये।



शिमला स्टैण्ड़ पर जैसे ही हमारे वाहन में ब्रेक लगा और ड्राईवर ने घोषणा की, कि हमारा गंतव्य आ गया है। सभी लोग उत्साह से नीचे उतरे और विस्मय से चारो ओर निगाह दौड़ाई। इसके बाद सभी ने अपने-अपने हिस्से का सामान उठाया और रास्ता पूछते हुए श्री दिगम्बर धर्मशाला के लिए चल पड़े। हालांकि वहां मौजूद सामान ढ़ोने वाले कई लोगों नेे सामान उठाने की पेशकश की, लेकिन अतिउत्साहित हमारी टीम के सभी बड़े-छोटे सदस्यों ने यथायोग्य सामान उठा लिया। खैर बस अड्डे से लोअर बाजार से मीडिल बाजार स्थित श्री दिगम्बर जैन धर्मशाला तक पहुंचते-पहुंचते मेरी पत्नी उनकी छोटी बहन सहित मंझली बहन की देवरानी की हालत तो खराब हो गयी, क्योंकि पूरा रास्ता सीढ़ी नुमा चढ़ाई करके ही धर्मशाला तक पहुंचा जा सकता है। खैर अन्ततः सभी लोग धर्मशाला पहुंच गये और कुछ सदस्यों को अपनी श्वांस ठीक करने में काफी  समय लगा। वहां हमने दो फैमिली रूम में बने चार डबलबैड के पार्टिशन में खुद को एड़जेस्ट कर लिया।                                                                                                                                                                                   क्रमशः


लेखक शिक्षा वाहिनी का कार्यकारी सम्पादक है