शरद ऋतु के आगमन के उपलक्ष में मनाया जाता है हिमाचल का सायर पर्व

शीला सिंह,  शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

 

          आश्विन महीने की  सक्रांति को कांगड़ा, मंडी, हमीरपुर, शिमला, बिलासपुर, सोलन, कुल्लू सहित अन्य जिलों में भी "सायर पर्व" मनाया जाता है। वास्तव में यह त्यौहार वर्षा ऋतु की समाप्ति और शरद ऋतु के आगमन के उपलक्ष में मनाया जाता है। इस समय खरीफ की फसल पक जाती है और काटने का समय होता है। भारी वर्षा, जल तांडव, भूमि कटाव से रक्षा हेतु भगवान का धन्यवाद करते हैं। बरसात की उमस भी मधुर मधुर ठंडे ठंडे वातावरण में परिवर्तित होने लगती है। अधिकतर फसल की कटाई शुरू होने से पहले "शायर पर्व "मनाया जाता है, ताकि वर्ष भर घर-परिवार में हर्ष समृद्धि बनी रहे। आश्विन मास की सक्रांति के आसपास पकने वाले फसल तथा सूखे मेवे शायर पर्व पर सबसे पहले भगवान को अर्पित किए जाते हैं।मक्की, खीरा, गलगल खट्टा और अखरोट भगवान को चढ़ाए जाते हैं।

ऐसी भी मान्यता है कि भादो महीने के दौरान देवी-देवता डायनों से युद्ध लड़ने देवालयों से चले जाते हैं। वे शायर के दिन वापस अपने देवालय में आ जाते हैं। इस दिन ग्रामीण क्षेत्रों के देवालय में देवी-देवता के गुर देव खेल के माध्यम से लोगों को देव-डायन युद्ध का हाल बताते हैं और यह भी बताते हैं कि इसमें किस पक्ष की जीत हुई है। वहीं बरसात के मौसम में किस घर के प्राणी पर बुरी आत्माओं का साया पड़ा है। ऐसी भी मान्यता है कि भादो महीने के दौरान विवाह के पहले साल दुल्हन-सास अपनी-अपनी परछाई एक-दूसरे के ऊपर नहीं डालती है। दुल्हन सास का मुंह नहीं देखती है ऐसे में वह एक महीने के लिए (काला महिना) मायके चली जाती है और शायर के दिन अपने ससुराल लौटती है।

              सायर पर्व कई स्थानों पर बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। जगह जगह मेले लगते हैं। ढोल-नगाड़े बजाए जाते हैं, लोक गीत और लोकनृत्यों का आयोजन किया जाता है। शिमला जिला के मशोबरा और सोलन जिला के अरकी में सांडों का युद्ध कराया जाता है। अरकी में सायर का मेला जिला स्तरीय होता है। कुल्लू में सायर को सैरी साजा के रूप में मनाया जाता है। सायर की पिछली रात को चावल और मटन की दावत दी जाती है। अगले दिन कुल देवता की पूजा की जाती है। साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता है। हलवा बनाकर सब में बांटा जाता है। एक-दूसरे को दुब जिसे स्थानीय भाषा में जूब कहते हैं, देकर उत्सव की बधाई दी जाती है।

लोगों का मानना है कि इस दिन देवी देवता स्वर्ग से धरती पर आते हैं, इसलिए ढोल नगाड़ों से उनका स्वागत किया जाता है।मंडी जिला में इस दिन अखरोट खरीदे और बांटे जाते हैं। बड़े हर्षोल्लास के साथ सायर पर्व मनाया जाता है। इसके अलावा कचौरी, सिडडू, चिलड़ू, गुलगुले जैसे पकवान भी बनाए जाते हैं। बड़े बुजुर्गों का आशीर्वाद लेने की भी परंपरा है, इसके लिए दूब देने वाला व्यक्ति अपने हाथ में 5 या 7 अखरोट व दूब लेता है, जिसे बड़े बुजुर्गों के हाथ में देकर उनके पांव छूकर आशीर्वाद लिया जाता है।

      दंतकथाओं के अनुसार लोहडी़ और सैर दो सगी बहनें थी। सायर की शादी गरीब घर में हुई थी, इसलिए आश्विन संक्रांति को मनाते हैं। उसके पकवान स्वादिष्ट तो होते हैं, परंतु बड़े महंगे नहीं होते, जबकि लोहडी की शादी अमीर घर में हुई, इसलिए शायद देसी घी, चिवड़ा, मूंगफली, खिचड़ी आदि कई मिठाइयों के साथ लोहड़ी मनाई जाती है। कांगड़ा, हमीरपुर, बिलासपुर में भी सायर मनाने का प्रचलन है। सायर की पूजा के 1 दिन पहले ही तैयारी शुरू कर दी जाती है। पूजा की थाली रात को ही सजा दी जाती है। धान के पौधे वालियों सहित तथा पतों सहित दो गलगल खट्टों की जोड़ी और नई फसलों का अंश थाली में सजाया जाता है। रात के चौथे प्रहर यानी प्रातः 4 -5 बजे गांव का नाई हर घर में सायर माता की मूर्ति के साथ जाता है। लोग उसे अनाज, पैसे तथा माता की सुहागी चढ़ावे के रूप में देते हैं। शहरों में तो यह प्रथा लुप्त होती जा रही है, परंतु गांव में अभी भी इस परंपरा को कहीं-कहीं संजो कर रखा हुआ है। अब लोग सैरी माता की जगह गणेश जी की पूजा करते हैं। नाई लोगों के घर बहुत कम जाते हैं, सायर पर्व वाले दिन पकवान बनाकर आस-पड़ोस और रिश्तेदारों में भी बांटे जाते हैं। हिमाचल में मनाए जाने वाले ये छोटे-छोटे त्यौहार और उत्सव अपना विशेष महत्व रखते हैं। लोगों को आपस में जोड़े रखते हैं। प्रेम भाव का विस्तार करते हैं। परंपराओं को जिंदा रखने के लिए यह त्यौहार बहुत ही महत्वपूर्ण है। यह परंपराएं हमें यूं ही खुशियां प्रदान करती रहें। 

 

बिलासपुर इकाई, हिमाचल प्रदेश