पद त्याग के पीछे कौन सी इच्छा छिपी है (शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र के वर्ष 13, अंक संख्या-22, 24 दिसम्बर 2016 में प्रकाशित लेख का पुनः प्रकाशन)


सुनील वर्मा, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।


बीजेपी के भीष्म पितामह आडवाणी जी ने लोक सभा छोड़ने की इच्छा जाहिर की। अब इस इच्छा के पीछे वो कौन सी इच्छा छिपी है, जिसने उनकी इस इच्छा को जन्म दिया। ये तो शायद कुछ लोग जानते भी हो, पर आज देश के दोनो सदनो में तीन-चौथाई बहुमत पाकर भी बीजेपी एक खानदान के चार-छ लोगों के सामने अहसाय नजर आ रही है। कारण क्या है, आज देश के हर नागरिक सिर्फ इस बात को सोचकर परेशान है, ऐसा क्यों हो रहा है? मुझे मालुम है। पिछली लोक सभा में बीएसपी और समाजवादी पार्टी के लगभग बराबर के सदस्य थे, लेकिन कभी इन दोनो पार्टी के सुप्रीमो से लेकर इनके सदस्यो तक किसी की हिम्मत नही होती थी, कि ये सोनिया गांधी के सामने पूछँ भी हिला सके उसकी वजह थी। इन पार्टियो के नेताओ की कमजोर नसें, जिनसे मायावती से लेकर मुलायम तक सांस लेते थे और आज भी सोनिया जी इनका भरपूर फायदा उठाती है, ये समझ में नही आता कि मुरली मनोहर जोशी और अडवाणी जैसे लोग लोक सभा में किस इच्छा को लेकर चुप है। क्या उनकीे भी कोई कमजोर कडी सोनिया के पास है या ये जान बुझकर अपनी ही पार्टी की फजीहत कराना चाहते है? संसद न चलने का दोष कांग्रेस को देना मुर्खता है। सच तो ये है कि कांग्रेस का इलाज तो इस देश की जनता ने बेखुबी कर दिया था, लेकिन बीजेपी ने इसका जरा सा भी फायदा नही उठाया। हां काश! इतना मौका अगर देश की जनता कांग्रेस को दे देती तो निश्चित रूप से कांग्रेस भाजपा को नेस्तेनाबूत कर देती, क्योकि आज अकेले अपने दम पर राहुल गाँधी भले ही फर्जी तरीके से ही शेर आया शेर आया कर रहे हो, लेकिन एक दबाव तो इस वक्त पूरी बीजेपी पर है ही। मै हर उस आदमी को चेंलेज करने के लिऐ तैयार हूँ जो ये कहता हो कि मोदी को विकास के ऐजेन्डे पर वोट मिला है। सच्चाई ये है कि देश की बहुसंख्यक जनता अल्पसंख्यक वाद के आंतक से दुखी थी और देश की जनता को इस दुखरू से निकलने का मोदी ही एक मात्र रास्ता दिखाई दे रहा था। जो मीडियम क्लास वर्ग था वो कांग्रेस के भ्रष्टाचार से दुखी था और जो सबसे निर्बल वर्ग था वो 10 रूपये से 11 रूपये बनाने के रास्ते की तलाश में था और बाकी का जो पढा-लिखा समाज था, जिन्मे युवा वर्ग भी शामिल था, वो ये समझ और जान रहा था कि शायद और देशो की तरह मोदी जी भी देश की नीतिया बहुसंख्यको के ध्यान में रखकर बनायेगें। अल्पसंख्को को नही, क्योकि भारत को छोडकर दुनिया में कोई भी देश ऐसा नही हैं, जिसकी नीतियां अल्पसंख्यकों को केन्द्र में रखकर बनाई जाती हों, जिसका पत्ता कांग्रेस आजतक फेटती आ रही है और भाजपा इस सच्चाई को अभी भी नही समझ रही है कि यूपी जैसे प्रदेश में 80 में से 73 सीटे विकास के ऐजेन्डे पर नही मिली है, बल्कि प्रदेश में मुस्लिम तुष्टीकरण से दुखी होकर लोगो ने तुम्हे लोकसभा में भेजा है, जिनका प्रतिनिधित्व करने में तुम बिलकुल विफल होते प्रतीत नजर आ रहे हो और ये दो खानदानो के चार-छ लोग आज भी तुष्टीकरण मे लिप्त होकर देश की लोक सभा को ठप्प करे बैठे है।
हालाँकि नोटबंदी की आड़ लेकर मोदी जी ने मदारी बनने की कोशिश जरूर की, लेकिन लोकसभा में न बोलने देने वाले उनके वक्तव्य ने फिलहाल तो उन्हें अभी बैक फुट पर ही ला दिया है। आप माने न माने आज पूरी बीजेपी अंडर ग्राउंड सी है और सोशल मीडिया ही मोदी के लिए बीजेपी के सांसद और विधायको की भूमिका निभा रही है। दुशासन का हाथ तोड़ने का काम जो बीजेपी के सांसदो को करना चाहिए था, वो द्रोपदी की साड़ी को लंबी करने में लगे हैं और एक आपसी महाभारत की पृष्ठभूमि की पटकथा तैयार कर रहे है, वर्ना तो बुल-बुल लोक सभा में ही नही राज्य सभा में भी नाँचती।


वरिष्ठ पत्रकार खतौली, (मुजफ्फरनगर) उत्तर प्रदेश