ब्राह्मण बनाम अंग्रेज

(प्रभाकर सिंह), शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

 

अंग्रेजों ने भारत पर लगभग 150 वर्षों तक राज किया। उनको भगाने का जबरदस्त आंदोलन क्यों चलाया, जबकि भारत पर सबसे पहले हमला मुस्लिम शासक मीर कासिम ने 712 ई. में किया था। उसके बाद महमूद गजनबी, मोहम्मद गौरी, चँगेज खाँ, इत्यादि ने हमले किये और फिर कुतुबदीन एबक, गुलाम वंश, तुग्लक वंश, खिल्जी वंश, लोधी वंश, फिर मुगल आदि वंषों ने भारत पर राज किया और हिन्दुओं पर खूब अत्याचार किये लेकिन ब्राह्मणों ने कभी कोई क्रांति या आंदोलन उनके खिलाफ नही चलाया, क्योंकि उन्होंने ब्राह्मणों को न केवल शासन प्रशासन में हिस्सेदारी दी बल्कि उनके आडंबरों, पाखंडों और अमानवीय कुव्यवस्थाओं में दखल भी नहीं दिया। इसके विपरीत अंग्रेजों ने ब्राह्मणों के आडंबरों, पाखंडों, कुव्यवस्थाओं और विशेष अधिकारों  को तोड़कर सभी पुरुषों, महिलाओं, धर्मों, शूद्रों, दलितों को समान अधिकार दे डाले, जिससे ब्राह्मण तिलमिला उठे और उन्होंने अपने अनुचित, विवेकहीन और अमानवीय अधिकारों की आजादी को देश की आजादी कहकर जनता को भड़का कर आजादी का आन्दोलन प्रारंभ कर दिया। 

इतिहास गवाह है कि अंग्रेजो ने सन् 1795 के अधिनियम 11 द्वारा शुद्रों (OBC) को भी सम्पत्ति रखने का कानून बनाया जिसका सवर्णो, विशेषकर ब्राह्मणों, ने विरोध किया। इस अधिनियम से पूर्व जाटों, अहीरों, गुर्जरों, पटेलों, कायस्थों, आदि शूद्र जातियों को भूमि का मालिकाना हक नहीं था। सन् 1773 में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने रेगुलेटिग एक्ट पास किया जिसमें न्याय व्यवस्था "समानता के सिद्धांत" पर आधारित की गई। 6 मई, 1775 को इसी कानून द्वारा बंगाल के सामन्त नन्द कुमार देव को फांसी दी गई थी। सन् 1804 के अधिनियम 3 द्वारा अंग्रेजों ने कन्या हत्या पर रोक लगाई। सन् 1813 में ब्रिटिश सरकार ने कानून बनाकर शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार सभी जातियों, दलितों, महिलाओं और धर्मों के लोगों के लिए समान कर दिया। सन् 1813 में ही अंग्रेजों ने दास प्रथा का अंत कानून बनाकर कर दिया। सन् 1817 में अंग्रेजों ने समान नागरिक संहिता कानून बना कर प्रत्येक नागरिक के लिए समान न्याय व्यवस्था की। (1817 से पहले सजा का प्रावधान वर्ण के आधार पर घोर भेदभाव पूर्ण था। एक अपराध के लिए ब्राह्मण को कोई सजा नही, जबकि उसी अपराध के लिए शुद्र को कठोरतम दंड दिया जाता था। सन् 1819 के अधिनियम 7 द्वारा ब्राह्मणों द्वारा शूद्र स्त्रियों के शुद्धिकरण पर रोक लगाई। (शूद्रों की शादी होने पर दुल्हन को दूल्हे के घर न जाकर कम से कम तीन रात ब्राह्मण के घर शारीरिक सेवा देनी पड़ती थी जिससे शूद्र स्त्रि तो शुद्ध/पवित्र होती थी।) सन् 1830 में अंग्रेजों ने नरबलि प्रथा पर पूर्ण रोक लगाई। सन् 1833 के अधिनियम 87 द्वारा सरकारी सेवा में भेद भाव पर अंग्रेजों ने रोक लगा दी जिससे योग्यता ही सेवा का आधार स्वीकार किया गया तथा कम्पनी के अधीन किसी भी भारतीय नागरिक को जन्म-स्थान, धर्म, जाति या रंग के आधार पर पद से वंचित नही रखा जा सकता था। सन् 1834 में पहले भारतीय विधि आयोग का गठन किया। कानून बनाने की व्यवस्था जाति, वर्ण, धर्म और क्षेत्र की भावना से ऊपर उठकर करना आयोग का प्रमुख उद्देश्य था।  सन् 1835 में प्रथम पुत्र को गंगा दान प्रथा पर रोक लगाई। (ब्राह्मणों ने नियम बनाया था कि शुद्रों के घर यदि पहला बच्चा लड़का पैदा हो तो उसे गंगा में फेंक देना चाहिये। 7 मार्च, 1835 को लार्ड मैकाले ने शिक्षा नीति को राज्य का विषय बना कर उच्च शिक्षा को अंग्रेजी भाषा के माध्यम से देना अनिवार्य बना दिया था। मैकाले ने भारतीय शिक्षा प्रणाली को अंतरराष्ट्रीय स्तर का बना दिया। 1835 में ही कानून बना कर अंग्रेजों ने दलितों को कुर्सी पर बैठने का अधिकार दिया था।। दिसम्बर 1829 के अधिनियम 17 द्वारा औरतों को मृत पति के साथ जलाना अवैध घोषित कर 'सती प्रथा' का अंत किया था। अंग्रेजों ने देवदासी प्रथा पर रोक लगाई। ब्राह्मणों के दबाव से शुद्र अपनी लडकियों को मन्दिरों की सेवा के लिए दान कर देते थे। मन्दिर के पुजारी उनका शारीरिक शोषण करते थे। बच्चे पैदा होने पर उन्हें फैंक देते थे। और उस बच्चे को हरिजन नाम देते थे। 1921 की जातिवार जन गणना के आंकड़ों के अनुसार अकेली मद्रास प्रेजीडेंसी में कुल जनसंख्या 4 करोड़ 23 लाख थी जिसमें 2 लाख से भी अधिक देव- दासियां मन्दिरों में अनाथ पड़ी थी। यह कुप्रथा अभी भी दक्षिण भारत के कुछ मन्दिरो में अवैध रूप से चल रही है। 1837 अधिनियम द्वारा ठगी प्रथा का अंत किया। 1849 में अंग्रेजों ने कलकत्ता में एक बालिका विद्यालय जे ई डी बेटन ने स्थापित किया। 1854 में अंग्रेजों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर के 3 विश्व विद्यालय कलकत्ता, मद्रास और मुम्बई में स्थापित किये। 1902 मे विश्वविद्यालय आयोग का गठन किया। 6 अक्टूबर,1860 को अंग्रेजों ने भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) बनाया जिसके द्वारा लार्ड मैकाले ने भारत में जाति, वर्ण, धर्म और लिंग के बिना एक समान दंड विधान (Criminal Law) लागु कर शदियों से जकडे शूद्रों की जंजीरों को काट डाला। 1863 मे अंग्रेजों ने कानून बनाकर चरक पूजा पर रोक लगाई। ( चरक पूजा के तहत आलिशान भवन, पुल या कूआँ निर्माण पर शुद्रों को पकड़ कर जिन्दा चिनवा दिया जाता था। ब्राह्मणों ने ऐसी मान्यता बना रखी थी कि ऐसा करने से भवन, पुल या कूँआ ज्यादा दिनों तक टिकाऊ रहेगें।) 1867 में बहू विवाह प्रथा पर पूरे देश में प्रतिबन्ध लगाने के उद्देश्य से अंग्रेजों की बंगाल सरकार ने एक कमेटी गठित की। 1871 में अंग्रेजों ने भारत में जातिवार गणना प्रारम्भ की। यह जनगणना 1941 तक हुई। 1948 में पण्डित नेहरू ने कानून बना कर जातिवार गणना पर रोक लगा दी। 1872 में अंग्रेजों ने सिविल मैरिज एक्ट द्वारा 14 वर्ष से कम आयु की कन्याओं एवम् 18 वर्ष से कम आयु के लड़को का विवाह वर्जित कर बाल विवाह पर रोक लगाई। अंग्रेजों ने महार और चमार रेजिमेंट बनाकर इन जातियों को सेना में भर्ती किया लेकिन गांधी, नेहरु जैसे सवर्णों के दबाव के कारण अंग्रेजों ने 1946 में चमार रैजिमैंट को बंद कर दिया तथा महार रेजिमैंट में भर्तियां सभी जातियों के लिए खोल दी गई। रैयत वाणी पद्धति  (Land Revenue System) बनाकर अंग्रेजों ने प्रत्येक पंजीकृत किसान को भूमि का स्वामी बनाकर उनसे बिना बिचौलिए के सीधा कृषि लगान लिया जाता था। (रैयत किसान को कहते हैं) 1918 में अंग्रेजों ने साऊथ बरो कमेटी को भारत में भेजा। यह कमेटी भारत में सभी जातियों का विधि मण्डल (कानून बनाने की संस्था) में भागीदारी के लिए आया था। छत्रपति शाहूजी महाराज के कहने पर पिछङो के नेता भाष्कर राव जाधव ने एवम् अछूतों के नेता डा बी आर अम्बेडकर ने अपने लोगों की विधि मण्डल में भागीदारी के लिये मेमोरेंडम दिया। 1919 में अंग्रेजो ने भारत सरकार अधिनियम का गठन किया । 1919 में ही अंग्रेजो ने ब्राह्मणों के जज बनने पर यह कह कर रोक लगा दी थी कि ब्राह्मणों के अंदर न्यायिक चरित्र यानि निष्पक्षता नही होता। 25 दिसम्बर,1927 को डा अम्बेडकर द्वारा मनुस्मृति का दहन किया गया। मनुस्मृति में शूद्रों और महिलाओं को गुलाम तथा भोग की वस्तु समझा जाता था। एक पुरूष को तो अनगिनत शादियां करने का धार्मिक अधिकार था, लेकिन महिला अधिकार विहीन तथा दासी की स्थिति में थी। एक-एक औरत के कई-कई सौतने हुआ करती थी। 1927 में अंग्रेजों ने कानून बनाकर शुद्रों को सार्वजनिक स्थानों पर जाने का अधिकार दिया। नवम्बर 1927 में अंग्रेजों ने साइमन कमीशन की नियुक्ति की थी, जो 1928 में भारत के अछूत लोगों की स्थिति का सर्वे करने और उनको अतिरिक्त अधिकार देने के लिए भारत आया था। इस कमीशन के भारत पहुँचते ही गांधी और लाला लाजपत राॅय ने इसके विरोध में बहुत बड़ा आंदोलन चलाया, जिस कारण साइमन कमीशन अधूरी रिपोर्ट लेकर वापस चला गया। इस पर अंतिम फैसले के लिए अंग्रेजों ने भारतीय प्रतिनिधियों को 12 नवम्बर, 1930 को लन्दन गोलमेज बैठक में बुलाया था। 24 सितम्बर 1932 को घोषित कम्युनल अवार्ड के तहत वयस्क मताधिकार; विधान मण्डलों और संघीय सरकार में जनसंख्या के अनुपात में अछूतों को आरक्षण का अधिकार, सिक्ख, ईसाई और मुसलमानों की तरह अछूतों (SC/ST) को भी प्रथक निर्वाचन क्षेत्र (Separate Electorate) का अधिकार मिला जिसके तहत प्रथक निर्वाचन क्षेत्रों में केवल अछूत प्रतिनिधि ही खड़े होंगे और उनका चुनाव भी केवल अछूत मतदाता ही करेगें तथा प्रतिनिधियों को चुनने के लिए अछूतों को दो बार वोट करने का अधिकार मिला, जिसमें एक बार सिर्फ अपने प्रतिनिधियों को वोट देंगे तथा दूसरी बार सामान्य प्रतिनिधियों को वोट देगे। 19 मार्च, 1928 को बेगारी प्रथा प्रथा को समाप्त कर दिया।

अंग्रेजों ने शासन प्रशासन में तथाकथित सवर्णों की भागी दारी को 100% से  घटाकर मात्र 6.5% पर लाकर खड़ा कर दिया था जिससे वे तिलमिला उठे थे। इन्ही सब कारणों की वजह से ही कथित सवर्णों ने अंग्रेजों के खिलाफ़ अपनी आजादी की क्रांति शुरू की दी, क्योकि अन्ग्रेजों ने शुद्रों, दलितों/अछूतों और महिलाओं को सारे अधिकार दे दिये थे और सब जातियो के लोगो को एक समान अधिकार देकर सबको बरा बरी मे लाकर खडा कर दिया था जो सवर्णों को बिल्कुल पसंद नहीं था।